चेन्नई के नेहरू इंडोर स्टेडियम में आज का सवेरा एक नई राजनीतिक पटकथा के साथ शुरू हुआ। तमिलनाडु की सत्ता, जो दशकों से दो बड़े द्रविड़ों के इर्द-गिर्द घूमती रही थी, आज वहां 'थलपति' विजय ने नौवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर एक नए युग की आधारशिला रख दी। स्टेडियम का कोना-कोना समर्थकों की गर्जना से गूंज रहा था, लेकिन इस शोर के बीच मंच पर बैठी एक शख्सियत ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। विपक्ष के नेता राहुल गांधी की इस शपथ ग्रहण समारोह में मौजूदगी ने केवल राज्य ही नहीं बल्कि देश की राजनीति में भी एक बड़ा संदेश प्रसारित कर दिया है। इसे केवल एक अभिनेता की राजनीतिक सफलता के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे भविष्य के एक बड़े विपक्षी गठबंधन की नींव के रूप में भी आंका जा रहा है। विजय का सफेद कमीज और वेष्टी में मंच पर आना और सादगी के साथ शपथ लेना उनके समर्थकों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था।

प्रशासनिक कमान और विजय का विजन

​शपथ ग्रहण के ठीक बाद जो सबसे महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई, वह विजय द्वारा विभागों का बंटवारा था। मुख्यमंत्री विजय ने स्पष्ट कर दिया है कि वे केवल नाम के मुखिया नहीं रहेंगे, बल्कि सत्ता की चाबी अपने पास रखेंगे। उन्होंने लोक प्रशासन, पुलिस और गृह विभाग जैसे सबसे संवेदनशील और ताकतवर मंत्रालय अपने पास रखे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पुलिस और गृह विभाग को अपने पास रखना इस बात का संकेत है कि विजय राज्य की कानून-व्यवस्था को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रख रहे हैं। उनके साथ नौ विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली है, जिनमें अनुभव और युवाओं के जोश का मिश्रण देखा जा सकता है। इन मंत्रियों में के. ए. सेंगोट्टैयान, अधव अर्जुना और डॉ. टी.के. प्रभु जैसे नाम शामिल हैं, जो अब राज्य की नई कैबिनेट का चेहरा होंगे। इन चेहरों के माध्यम से विजय ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि उनकी सरकार समावेशी और विकासोन्मुखी होगी।

राहुल गांधी की उपस्थिति और राष्ट्रीय समीकरण


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​इस पूरे घटनाक्रम में राहुल गांधी की मौजूदगी ने उन चर्चाओं को हवा दे दी है कि क्या तमिलनाडु आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति की नई प्रयोगशाला बनने वाला है। राहुल गांधी का विजय के शपथ ग्रहण में शामिल होना यह दर्शाता है कि कांग्रेस और तमिलगा वेत्री कड़गम के बीच एक गहरा आपसी विश्वास पनप रहा है। राहुल गांधी ने मंच से विजय को गले लगाकर अपनी शुभकामनाएं दीं, जिसे राजनीतिक पंडित एक नए 'दोस्ताना गठबंधन' की शुरुआत मान रहे हैं। विपक्षी खेमे के अन्य नेताओं ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। जहां एक तरफ एम.के. स्टालिन ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए बधाई दी, वहीं एदापल्ली के. पलानीस्वामी ने इसे कड़ी चुनौती के तौर पर स्वीकार किया है। कमल हासन ने भी एक साथी कलाकार की इस उपलब्धि पर खुशी जाहिर की है, लेकिन साथ ही प्रशासनिक कसौटी पर खरे उतरने की चेतावनी भी दी है।

चुनौतियां और जनता की उम्मीदें

​समारोह की चकाचौंध खत्म होने के बाद अब विजय के सामने असली चुनौती राज्य को चलाने की है। तमिलनाडु की जनता की उम्मीदें आसमान पर हैं और विपक्षी दल भी अब विजय के हर कदम की बारीकी से समीक्षा करेंगे। राज्यपाल ने उन्हें तेरह मई तक बहुमत साबित करने का समय दिया है, जो एक संवैधानिक प्रक्रिया है लेकिन विजय के लिए यह अपनी ताकत दिखाने का पहला मौका होगा। बीजेपी की ओर से भी सधी हुई प्रतिक्रिया आई है, जहां उन्होंने द्रविड़ राजनीति में बदलाव की बात कही है। अब देखना यह होगा कि सिनेमाई पर्दे पर असंभव को संभव करने वाले थलपति विजय राजनीति की इस कठिन पिच पर कितनी लंबी पारी खेलते हैं। गृह विभाग के जरिए वे राज्य में क्या बदलाव लाते हैं और राहुल गांधी के साथ उनकी यह नजदीकी दिल्ली की राजनीति को कितना प्रभावित करती है, यह आने वाले कुछ महीनों में साफ हो जाएगा।

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