तराई के मुख्य द्वार रुद्रपुर की जमीन जब सियासी नारों से गूंजती है, तो उसकी धमक सिर्फ देहरादून तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सीधे दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक महसूस की जाती है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का रुद्रपुर दौरा महज एक सांगठनिक प्रवास नहीं था, बल्कि यह तराई अंचल की जटिल सामाजिक-राजनीतिक जमीन पर कब्जा जमाने की एक गहरी रणनीति का हिस्सा नजर आता है। रामपुर रोड स्थित एक निजी होटल में 'पंजाबी गौरव सम्मान' कार्यक्रम के बहाने भाजपा ने अपनी चुनावी मशीनरी का पहिया एक बार फिर तेजी से घुमा दिया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विरोध के सुरों और बदलती सामाजिक प्राथमिकताओं के बीच भाजपा का यह दांव तराई के किले को सुरक्षित कर पाएगा?
नाम बदलने का गणित: 'सिख' से 'पंजाबी' तक का सोच-समझकर लिया गया फैसला
इस पूरे आयोजन में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात वह विवाद रही, जिसे पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल ने हवा दी। ठुकराल का दावा है कि इस कार्यक्रम का नाम पहले 'सिख सम्मेलन' तय किया गया था, जिसे ऐन वक्त पर बदलकर 'पंजाबी गौरव सम्मान' कर दिया गया।
अगर इस दावे को राजनीतिक चश्मे से देखें, तो यह बदलाव बेवजह नहीं है। तराई के सामाजिक ताने-बाने को समझने वाला हर व्यक्ति जानता है कि यहाँ की आबादी में केवल सिख समाज ही नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा गैर-सिख पंजाबी समुदाय (जैसे खत्री, अरोड़ा और अन्य व्यापारी वर्ग) भी रसा-बसा है।
इसके अलावा, एक व्यावहारिक सच्चाई यह भी है कि सिर्फ पगड़ी बांध लेने मात्र से कोई सिख नहीं हो जाता; सिख होना एक धार्मिक आस्था है, जबकि पंजाबी एक भाषाई और सांस्कृतिक पहचान है।
ऐसे में भाजपा ने धार्मिक विवादों की किसी भी गुंजाइश को पूरी तरह खत्म करते हुए 'पंजाबी गौरव' का दायरा चुना। इससे पार्टी ने सिख और गैर-सिख दोनों पंजाबी वर्गों को एक मंच पर लाने का दांव खेला, जिससे रुद्रपुर, काशीपुर, बाजपुर से लेकर यूपी की सीमावर्ती बिलासपुर तहसील तक के व्यापारी व किसान तबके को एक साथ साधा जा सके।
1984 का जिन्न: हर बड़े मंच से कांग्रेस को घेरने की मजबूरी या जरूरत?
कार्यक्रम में पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के भाषण का एक बड़ा हिस्सा 1984 के सिख दंगों और कांग्रेस के अतीत पर केंद्रित रहा। आखिर क्यों जब भी कोई बड़ा राजनीतिक अवसर आता है, तो भाजपा 1984 के पन्नों को पलटना नहीं भूलती?
दरअसल, यह भाजपा की एक परखी हुई राजनीतिक शैली है। जब भी विपक्षी दल भाजपा को किसी मुद्दे पर घेरने का प्रयास करते हैं, भाजपा तुरंत 1984 के ऐतिहासिक संदर्भ को सामने रखकर कांग्रेस के नैतिक आधार पर हमला बोल देती है। तराई में पंजाबी समाज के बीच 1984 का जिक्र करना कांग्रेस के पारंपरिक वोटों में सेंध लगाने का एक आजमाया हुआ हथियार है।
इसके साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दंगों के आरोपियों को सजा दिलाने के प्रयासों का जिक्र करके भाजपा खुद को एक 'न्यायप्रिय और रक्षक' दल के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है। यह संदेश देने की कोशिश होती है कि कांग्रेस ने जहाँ जख्म दिए थे, भाजपा ने वहाँ मरहम लगाने और इंसाफ दिलाने की दिशा में काम किया है।
वैश्विक उपलब्धियाँ और कांग्रेस का नाम: नैरेटिव सेट करने की कला
चाहे प्रधानमंत्री हों या पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन, भाजपा का कोई भी नेता अपने भाषणों में ब्रिक्स, जी-20 या एआई समिट जैसी अंतरराष्ट्रीय सफलताओं का जिक्र करते हुए कांग्रेस को घसीटना नहीं भूलता। रुद्रपुर के मंच से भी यही हुआ।
इसके पीछे सीधा सा गणित है—भाजपा जनता के सामने हमेशा 'मजबूत राष्ट्र निर्माण' बनाम 'विपक्ष का नकारात्मक रुख' का एक साफ खाका खींचना चाहती है। जब राष्ट्रीय अध्यक्ष यह कहते हैं कि देश दुनिया में आगे बढ़ रहा है और कांग्रेस रोड़े अटका रही है, तो वे आम मतदाता के मन में यह बैठाने का प्रयास करते हैं कि भाजपा का विरोध दरअसल देश की प्रगति का विरोध है। इससे चुनावी मैदान में कोई तीसरा विकल्प पनप ही नहीं पाता और मुकाबला सीधे 'भाजपा बनाम कांग्रेस' पर आकर टिक जाता है।
विरोध की आग और तराई का कड़ा मुकाबला
हालांकि, होटल के भीतर जब भाजपा अपना गणित सुलझा रही थी, तो बाहर सड़कों पर परिदृश्य बिल्कुल अलग था। इंदिरा चौक पर यूथ कांग्रेस का काली पट्टी बांधकर उग्र प्रदर्शन, नितिन नबीन का पुतला दहन और "वापस जाओ" के नारे यह साफ बताते हैं कि तराई की जंग इतनी आसान नहीं रहने वाली।
हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल को मंदिर से बाहर आते ही पुलिस द्वारा हिरासत में लिया जाना इस बात का संकेत है कि भाजपा के भीतर से निकले पुराने चेहरे और स्थानीय विरोधी गुट भी शांत बैठने वाले नहीं हैं। ठुकराल का लखनऊ की घटना को लेकर विरोध जताना भाजपा के धार्मिक और सांस्कृतिक दावों पर ही सवाल खड़े करने की कोशिश थी।
संदेश साफ है, लेकिन राह आसान नहीं
'पंजाबी गौरव सम्मान' के माध्यम से भाजपा ने स्पष्ट संदेश दिया है कि तराई अंचल के व्यापारी, किसान और पंजाबी वर्ग पर उसकी नजर पूरी तरह गढ़ी हुई है। लगभग सैकड़ों की संख्या में पहुंचे पार्टी समर्थकों ने पार्टी का हौसला तो बढ़ाया, लेकिन सड़कों पर हुआ कड़ा विरोध और अंदरूनी असंतोष यह बयां करता है कि केवल सम्मान समारोह और पुराने जख्मों को याद दिला देने से तराई का किला पूरी तरह फतह नहीं होगा।
तराई का मतदाता हमेशा से बेहद सतर्क रहा है। आने वाले समय में देखना होगा कि 'पंजाबी गौरव' का यह दांव भाजपा की झोली में वोट बरसाता है, या फिर कांग्रेस और स्थानीय विरोधियों की यह हलचल उसके समीकरणों को बिगाड़ देती है।
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