सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के हालिया हमलों के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का यमन में हवाई हमले करने की धमकी देना पूरी तरह हास्यास्पद नजर आता है। विदेशी भीख और कर्ज के सहारे अपनी सांसें चला रहा देश अब खुद को मध्य पूर्व का रक्षक साबित करने का नाटक रच रहा है। यमन में हूती ठिकानों को निशाना बनाने का दावा करने वाला इस्लामाबाद यह भूल रहा है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी अपनी हैसियत एक कट कटोरा लिए खड़े याचक से ज्यादा कुछ नहीं है। अपनी जर्जर और खोखली सैन्य ताकत का ढोल पीटकर वह दुनिया के सामने खुद को एक बड़ी क्षेत्रीय शक्ति के रूप में पेश करने का हास्यास्पद प्रयास कर रहा है।
यह पूरी बयानबाजी 'मक्का रक्षा समझौते' की आड़ में रची जा रही है। पाकिस्तान का दावा है कि यदि सऊदी अरब औपचारिक मदद मांगता है, तो वह तुरंत अपनी वायुसेना भेज देगा। हालांकि, पर्दे के पीछे की कड़वी असलियत यह है कि पाकिस्तान केवल रियाद से मिलने वाली आर्थिक मदद, खैरात और रियायती तेल के बदले अपनी सैन्य वफादारी बेचने की फिराक में है। जिस देश की अपनी वायुसेना ईंधन और बुनियादी कलपुर्जों की भयंकर किल्लत से जूझ रही हो, उसका एक दूरदराज के युद्ध में कूदने की बात करना केवल एक राजनीतिक तमाशा है, ताकि अपने विदेशी आकाओं को खुश करके कुछ और डॉलर ऐंठ सके।
हूती विद्रोहियों के बहाने पाकिस्तान अपने पुराने आक्रामक तेवर दिखाकर भारत को भी परोक्ष रूप से चेतावनी देने की बचकानी कोशिश कर रहा है। अपनी सैन्य क्षमता का झूठा दंभ भरकर वह दिल्ली को यह संदेश देना चाहता है कि वह अपनी सीमाओं से बाहर भी सैन्य कार्रवाई करने में सक्षम है। हालांकि, भारत के सामने अपनी खोखली धमकियों का प्रदर्शन करना केवल उसकी मानसिक हताशा को उजागर करता है। दुनिया के विशालतम रक्षा बजट और आधुनिकतम सैन्य शक्तियों में शुमार भारत के सामने एक कंगाली से पस्त देश का यह आक्रामक रवैया पूरी तरह से बेतुका और बेबुनियाद है।
पाकिस्तान की मौजूदा हैसियत यह है कि उसका विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह रसातल में पहुंच चुका है और वह अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की शर्तों के सामने घुटने टेके हुए है। देश के भीतर महंगाई से पिस रही जनता को दो वक्त की रोटी तक मयस्सर नहीं है, लेकिन उसके हुक्मरान दूसरों के युद्ध में टांग अड़ाने और पड़ोसियों को आंख दिखाने का झूठा दंभ भर रहे हैं।
इसके अलावा, अपने ही देश के भीतर उग्रवाद और आंतरिक तबाही के दौर से गुजर रहा इस्लामाबाद अपनी सुरक्षा व्यवस्था तक संभालने में नाकाम साबित हुआ है। सीमाओं के भीतर अपनी साख गंवा चुका यह मुल्क केवल बड़ी-बड़ी बयानबाजी कर सकता है। दुनिया अच्छी तरह जानती है कि भीख मांगकर चलने वाला यह मुल्क केवल बड़ी-बड़ी बातें कर सकता है, जबकि हकीकत में उसकी हैसियत अपने खुद के वजूद को बचाने से ज्यादा कुछ नहीं है।
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