राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अमेरिका के न्यूयॉर्क में आयोजित 'अहेड फोरम' (अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग) के तत्वधान में फेथ लीडर्स कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए भारत के महान और समावेशी दर्शन को दुनिया के सामने रखा। सौ से अधिक देशों के प्रतिनिधियों, विद्वानों और धर्मगुरुओं की उपस्थिति में संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि हिंदुत्व किसी को अपने से दूर करने या बाहर निकालने का विचार नहीं है। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए या उन्हें देश से बाहर कर दिया जाना चाहिए, तो ऐसा सोचने वाला व्यक्ति हिंदू की श्रेणी में ही नहीं आता। मानवता की अखंडता और सर्वसमावेशी स्वरूप ही इस पुरातन विचार की वास्तविक आत्मा है।

​संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि 'यूनिटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका' में जिस बहुलतावादी समाज की बात कही जाती है और भारत में जिस 'विविधता में एकता' की चर्चा होती है, वे दोनों ही सिद्धांत भारतवर्ष के संस्कार और उसके डीएनए में गहराई से समाए हुए हैं। भारत की महान सांस्कृतिक विरासत का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सत्य केवल एक है, यद्यपि उस तक पहुँचने के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं। दुनिया के जिस भी कोने में लोगों को उनके विश्वास के कारण सताया गया, उन्हें भारत ने सदैव सहर्ष अपने हृदय में स्थान दिया है। विविधता प्रकृति का सुंदर आभूषण और उसका अटल नियम है, जबकि उस विविधता के पीछे छिपी हुई आंतरिक एकता ही इस ब्रह्मांड की अंतिम और शाश्वत सत्यता है।

'हम और हमारा' की सामूहिक भावना जरूरी

​अपने उद्बोधन के दौरान संघ प्रमुख ने वर्ष 1996 में हरियाणा के चरखी दादरी के आकाश में हुए उस भयानक विमान हादसे का विशेष उल्लेख किया, जिसमें सऊदी अरब और कजाकिस्तान के दो नागरिक विमान आपस में टकरा गए थे। दुर्घटना में मारे गए अधिकांश यात्री मुस्लिम समुदाय के थे। उस दुखद घड़ी का स्मरण करते हुए भागवत ने बताया कि दुर्घटना की सूचना मिलते ही सबसे पहले राहत और बचाव कार्य के लिए घटनास्थल पर पहुँचने वाले लोग संघ के ही स्वयंसेवक थे। स्वयंसेवकों ने बिना किसी भेदभाव के क्षत-विक्षत शवों को निकाला, घायलों की सेवा की और उनके धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार की उचित व्यवस्था करवाई।


Advertisement

​भागवत ने कहा कि हमारे कार्यकर्ताओं ने उस समय यह विचार बिल्कुल नहीं किया कि वे किस धर्म या समुदाय की सहायता कर रहे हैं। सेवा का यह निस्वार्थ कार्य केवल इसलिए संभव हो सका क्योंकि संघ चुनावी राजनीति की परिधि से बाहर रहकर निस्वार्थ भाव से कार्य करता है। यदि हम प्रत्यक्ष राजनीति में संलग्न होते, तो शायद हमारे मन में भी राजनीतिक नफा-नुकसान की चिंता आड़े आ जाती। राजनीति समय के साथ स्वार्थ और 'मैं और मेरा' का एक सीमित खेल बनकर रह गई है, जिससे वैश्विक समस्याओं का स्थाई समाधान संभव नहीं है। जब तक समाज में 'हम और हमारा' की सामूहिक भावना जागृत नहीं होगी, तब तक राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना अधूरी ही रहेगी।

प्रेम और भाईचारे की नई मिसाल कायम

​आरएसएस के शताब्दी वर्ष के वैश्विक संपर्क अभियान के तहत आयोजित यह सम्मेलन शुरुआत से ही कूटनीतिक और राजनीतिक बहसों के केंद्र में आ गया था। न्यूयॉर्क शहर के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने सार्वजनिक रूप से इस कार्यक्रम का कड़ा विरोध करते हुए संघ की विचारधारा को समावेशी समाज की भावना के विपरीत बताया था। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर बने अमेरिकी आयोग (USCIRF) ने अमेरिकी सरकार से संघ नेताओं के वीजा रद्द करने और कड़े प्रतिबंध लगाने की अनुचित मांग की थी। हालाँकि, भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने इन बयानों को पूरी तरह से पूर्वाग्रह से ग्रस्त और निष्पक्षता से परे बताकर सिरे से खारिज कर दिया।

​तमाम राजनीतिक विरोधों, विरोध प्रदर्शनों और निजी आयोजनों पर रोक लगाने की अपीलों के बावजूद सम्मेलन तय समय पर संपन्न हुआ। नाइजीरिया के प्रमुख कैथोलिक धर्मगुरु कार्डिनल जॉन ओलोरुनफेमी ओनाइयेकेन सहित कई वैश्विक धार्मिक हस्तियों ने संघ प्रमुख के साथ मंच साझा किया। उन्होंने भी इस बात से सहमति व्यक्त की कि पुरानी प्रतिद्वंद्विता और इतिहास के कड़वे अनुभवों को पीछे छोड़कर ही वैश्विक समुदाय आपस में प्रेम और भाईचारे की नई मिसाल कायम कर सकता है।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैश्विक प्रभाव

​वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि मोहन भागवत का यह अमेरिका दौरा विदेशों में फैलाई गई संघ-विरोधी भ्रांतियों को ध्वस्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। वर्षों से गढ़ी जा रही नकारात्मक आख्यानों के विपरीत, जब संघ का शीर्ष नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाकर भारत के मूल सह अस्तित्व के सिद्धांतों की व्याख्या करता है, तो उससे वैश्विक बौद्धिक वर्ग में एक सकारात्मक संदेश जाता है। मोहन भागवत ने स्वयं भी यह स्पष्ट किया कि गलत आख्यानों और भ्रामक प्रचार के कारण संगठन के प्रति कुछ पूर्वाग्रह बन जाते हैं, परंतु जब लोग संघ के निष्काम सेवा कार्यों को करीब से देखते हैं, तो ये तमाम भ्रांतियां एक ही पल में दूर हो जाती हैं। यह वैश्विक दौरा भारत की सांस्कृतिक सोच को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम सिद्ध हो रहा है।

आरएसएस प्रमुख से क्यों नहीं मिलती बीजेपी नेताओं की सोच

​अक्सर यह सवाल उठता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के बयानों और भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं की बयानबाज़ी में इतना अंतर क्यों दिखाई देता है। इसका उत्तर दोनों संगठनों के मूलभूत चरित्र और उनकी कार्यपद्धति में छिपा हुआ है। संघ एक दीर्घकालिक सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन है, जो चुनावी राजनीति से दूर रहकर संपूर्ण समाज को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास करता है। सरसंघचालक का मार्गदर्शन किसी एक वर्ग या तात्कालिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की सामूहिक चेतना और 'सर्वधर्म समभाव' के शाश्वत भारतीय दर्शन को ध्यान में रखकर होता है। संघ प्रमुख का दृष्टिकोण 'व्यक्ति निर्माण' और सामाजिक समरसता पर केंद्रित रहता है।

​इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी एक लोकतांत्रिक राजनीतिक दल है जिसे हर कुछ महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में छोटे-बड़े चुनाव लड़ने पड़ते हैं। चुनावी समर के अपने कठोर समीकरण होते हैं, जहाँ कई बार वोटों के लामबंदी, चुनावी ध्रुवीकरण और अपने कैडर के उत्साह को बनाए रखने के लिए आक्रामक और तीखी बयानबाजी का सहारा लिया जाता है। जहाँ राजनीति तात्कालिक जीत और सत्ता प्राप्ति के सीमित दायरे में सोचती है, वहीं संघ का नेतृत्व सदियों पुरानी भारतीय परंपरा और 'वसुधैव कुटुंबकम' के व्यापक आलोक में विचार करता है। यही कारण है कि चुनावी भाषा की उग्रता और संघ प्रमुख की दार्शनिक वाणी में वैचारिक भिन्नता स्पष्ट दिखाई देती है।

---समाप्त---