उत्तराखंड के सीमांत और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों से हर साल हज़ारों युवा अपनी आँखों में प्रशासनिक सेवाओं, रक्षा बल और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के सपने सजाते हैं। लेकिन सरकार के डिजिटल दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फासला इन सपनों पर ग्रहण लगा रहा है।
पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी व बागेश्वर जैसे जिलों के गाँवों में बैठकर तैयारी करना किसी कठोर तपस्या से कम नहीं है। सरकारें 'डिजिटल कोचिंग' और 'ऑनलाइन पोर्टल' का ढोल तो खूब पीटती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि जहाँ मोबाइल में सिग्नल की एक काँटी के लिए छात्रों को पेड़ों या पहाड़ियों पर चढ़ना पड़े, वहाँ स्मार्ट पढ़ाई के दावे किसी क्रूर मजाक जैसे लगते हैं। गुणवत्तापूर्ण कोचिंग संस्थानों, सर्वसुविधायुक्त पुस्तकालयों और सही मार्गदर्शन का पूरा ढांचा देहरादून और हल्द्वानी जैसे मैदानी शहरों में सिमट कर रह गया है। नतीजतन, मध्यम और निम्न-वर्ग के परिवारों को भारी आर्थिक तंगी के बावजूद अपने बच्चों को मैदानी इलाकों में भेजने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जो राज्य में शिक्षा पलायन के रूप में एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक संकट खड़ा कर रहा है।
डिजिटल क्रांति का ढोल पर धरातल नेटवर्क विहीन
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को आसान बनाने के नाम पर ऑनलाइन पोर्टल और ऐप लॉन्च कर देना कागज़ों पर भले ही एक क्रांतिकारी कदम दिखे, लेकिन पहाड़ों का विषम भूगोल इस दिखावटी आधुनिकता की पोल खोल देता है। पर्वतीय गाँवों में नेटवर्क का नदारद होना कोई नई बात नहीं है। मानसून के महीनों में तो जब ऑप्टिकल फाइबर कटते हैं या टावर ठप होते हैं, तब हफ्तों तक बाहरी दुनिया से संपर्क कट जाता है। ऐसे में लाइव ऑनलाइन क्लास लेना तो दूर, परीक्षा का फॉर्म भरना या एक छोटी सी अध्ययन सामग्री की फाइल डाउनलोड करना भी लोहे के चने चबाने जैसा हो जाता है। इसके ऊपर से अनिश्चित बिजली कटौती स्मार्ट उपकरणों को महज शोपीस बना देती है। शहरों में जहाँ छात्र वातानुकूलित लाइब्रेरी में बैठकर 10 से 12 घंटे निर्बाध पढ़ाई करते हैं, वहीं गाँव का छात्र बिजली और इंटरनेट की अनिश्चितता से जूझते हुए ही अपना आधा हौसला हार बैठता है।
पीडीएफ का पुलिंदा पर मार्गदर्शन शून्य
सरकारी तंत्र यह भूल जाता है कि प्रतियोगी परीक्षाएं केवल किताबों को रटने या मोबाइल पर पीडीएफ का ढेर इकट्ठा करने से पास नहीं होतीं। आधुनिक दौर की परीक्षाओं में मुख्य परीक्षा का उत्तर लेखन, मॉक इंटरव्यू, समकक्ष छात्रों के साथ विषयगत चर्चा और लगातार मूल्यांकन सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। वाट्सऐप ग्रुपों में स्टडी मटीरियल की पीडीएफ भेजकर कर्तव्य की इतिश्री कर लेने वाले अधिकारियों को यह समझना होगा कि बिना व्यक्तिगत मेंटरशिप के ये फाइलें केवल डिजिटल कचरा बनकर रह जाती हैं। मैदानी शहरों में रहने वाले अभ्यर्थियों को जो माहौल, अनुभवी शिक्षकों का मार्गदर्शन और ग्रुप डिस्कशन का मौका आसानी से मिल जाता है, उससे पहाड़ का युवा पूरी तरह वंचित है। बिना सही दिशा और मूल्यांकन के केवल किताबों के सहारे इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा में टिके रहना लगभग असंभव साबित हो रहा है।
खोखले वादे नहीं, ठोस बदलाव की दरकार
अगर सरकार सचमुच पर्वतीय क्षेत्रों के युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की मुख्यधारा में बराबरी का हक देना चाहती है, तो उसे कागजी प्रचार से बाहर निकलकर धरातल पर बुनियादी ढांचा तैयार करना होगा। केवल ऐप बना देने से काम नहीं चलेगा, हर ब्लॉक और तहसील स्तर पर हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड इंटरनेट, सोलर पावर बैकअप और अद्यतन किताबों से लैस 'सार्वजनिक स्टडी हब' का निर्माण करना होगा। इसके अलावा सरकारी डिजिटल सिस्टम को 'ऑफलाइन-फर्स्ट' मॉडल पर बनाना होगा, जिससे छात्र एक बार डाउनलोड की गई सामग्री को बिना इंटरनेट के भी पढ़ सकें। साथ ही जिला स्तर पर कार्यरत प्रशासनिक अधिकारियों और शिक्षाविदों का एक मेंटरशिप नेटवर्क तैयार कर दूरस्थ छात्रों के लिए नियमित मॉक इंटरव्यू और मार्गदर्शन सत्र आयोजित किए जाने चाहिए।
जब तक बिजली, नेटवर्क और स्थानीय स्तर पर पढ़ने के लिए शांत स्थान जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं की जातीं, तब तक स्मार्ट कोचिंग के सारे दावे खोखले ही साबित होंगे। अब वक्त आ गया है कि सरकारें दूरस्थ क्षेत्र के अभ्यर्थियों की इस लाचारी को समझे और डिजिटल दिखावे के बजाय जमीनी स्तर पर ठोस संसाधन मुहैया कराए।
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