ऐतिहासिक या प्राचीन इंफ्रास्ट्रक्चर का आधुनिकीकरण और पुनरुद्धार अक्सर विकास, लागत बचत और प्रशासनिक दक्षता का प्रतीक माना जाता है। हालांकि बिलासपुर के शताब्दी वर्ष पुराने भाखड़ा वियर गेट के पिलर्स में आई गंभीर दरारें, धंसी नहर की पुलिया और सुरक्षा बंदे के ढहने जैसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि बिना समग्र इंजीनियरिंग अध्ययन के प्राचीन ढांचों में फेरबदल करना कितना तर्कसंगत है। जब सौ साल पुरानी संरचनाओं में आधुनिक तकनीक को जबरन फिट करने का प्रयास किया जाता है, तो यह लाभ के बजाय बड़ी तबाही का कारण बन जाता है। इस पूरे विषय को समझने के लिए इसके पक्ष और विपक्ष का गहराई से संरचनात्मक, आर्थिक तथा व्यावहारिक विश्लेषण करना आवश्यक है।

​पुराने ढांचों का आधुनिकीकरण या जीर्णोद्धार कई मायनों में सही और व्यावहारिक प्रतीत होता है। आर्थिक दृष्टि से देखें तो किसी संपूर्ण बांध, वियर या पुल को पूरी तरह से ध्वस्त करके नए सिरे से बनाना सरकारी खजाने पर अत्यधिक वित्तीय बोझ डालता है। इसके विपरीत, मौजूदा बुनियादी ढांचे को मजबूत करके उसकी उपयोगिता अवधि बढ़ाना काफी किफायती विकल्प माना जाता है। इसके अलावा, नए निर्माण में वर्षों का समय लगता है, जिससे जल आपूर्ति, यातायात या किसानों की सिंचाई प्रणाली लंबे समय तक ठप हो सकती है। जीर्णोद्धार का काम कम समय में पूरा करके सेवाओं को निर्बाध जारी रखा जा सकता है। ऐतिहासिक संरचनाओं की अपनी एक मजबूती और वास्तुशिल्पीय पहचान होती है, जिसे सहेजते हुए नए उपकरणों को जोड़ना सैद्धांतिक रूप से एक बेहतर कदम लगता है।

​भाखड़ा वियर जैसे मामलों में आधुनिकीकरण का मुख्य उद्देश्य जल संरक्षण क्षमता को बढ़ाना और सिंचाई का दायरा फैलाना था। ऑटोमेटिक गेट लगाने से पानी का अपव्यय रुकता है और मानव श्रम पर निर्भरता कम होती है। आंकड़ों के लिहाज से यह क्षमता नब्बे हजार हेक्टेयर से बढ़कर एक लाख सत्रह हजार हेक्टेयर से अधिक होने का अनुमान था, जो कृषि प्रधान क्षेत्रों के लिए बहुत आकर्षक विचार था। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब इस पूरी प्रक्रिया में संरचनात्मक अनुकूलता और हाइड्रोलिक दबाव को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया जाता है। यहीं से रेनोवेशन का यह तरीका पूरी तरह गलत और आत्मघाती साबित होने लगता है।

​ब्रिटिशकाल में निर्मित भाखड़ा वियर जैसे ढांचे लकड़ी के पटलों और प्राकृतिक जल प्रवाह के हिसाब से डिजाइन किए गए थे। उस दौर के इंजीनियरों ने पानी के दबाव को सीमित रखने और अतिरिक्त जल को स्वतः बह जाने देने की व्यवस्था की थी। जब उन पटलों को हटाकर भारी-भरकम ऑटोमेटिक गेट लगा दिए गए, तो वियर में रोका जाने वाला पानी का स्तर और उसका पार्श्व दबाव कई गुना बढ़ गया। विडंबना यह रही कि तीस करोड़ रुपये के भारी बजट में से अधिकांश हिस्सा नए ऑटोमेटिक गेट लगाने में खर्च कर दिया गया, लेकिन उस जलदाब को झेलने वाले वियर गेट के मुख्य पिलर्स, 100 साल पुरानी नींव, दीवारों और पास के बंदों को मजबूत करने पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।


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​यह असंतुलन आधुनिक इंजीनियरिंग की उस बड़ी भूल को उजागर करता है जिसे संरचनात्मक बेमेल कहा जाता है। चूने, सुर्खी और विशिष्ट ईंट-पत्थरों से बने पिलर्स तथा मेहराब आधुनिक कंक्रीट और भारी मैकेनिज्म के अस्वाभाविक दबाव को सहने में अक्षम साबित हुए। जब पानी का अस्वाभाविक दबाव बढ़ा, तो वियर गेट के पिलर्स और सपोर्टिव स्ट्रक्चर में गंभीर दरारें उभरा आईं। जल प्रवाह के नीचे से कटने के कारण नहर की पुलिया धंस गई और सुरक्षा बंदा ढह गया।

​रेनोवेशन का एक और गलत पहलू विभागीय लापरवाही और कामचलाऊ मरम्मत की संस्कृति है। अक्सर ठेकेदार और संबंधित विभाग केवल सतही लीपापोती को ही जीर्णोद्धार मान लेते हैं। जब एक पखवाड़े पूर्व बंदे में पहली बार धंसाव दिखा था, तो उसे लकड़ी की बल्लियों और मिट्टी से भरे कट्टों की मदद से रोकने का औपचारिकता मात्र प्रयास किया गया। किसी पुराने ढांचे के पिलर्स में यदि दरारें और धंसाव दिखता है, तो वह किसी बड़ी आपदा का पूर्व चेतावनी संकेत होता है। ऐसे में कंक्रीट जीर्णोद्धार, ग्राउटिंग और पिलर्स को जैकेटिंग तकनीक से मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता होती है, लेकिन प्रशासनिक खानापूर्ति ने स्थिति को और विकराल बना दिया।

आखिर में ​निष्कर्ष के तौर पर यह कहा सकता है कि पुराने स्ट्रक्चर का जीर्णोद्धार करना अपने आप में गलत नहीं है, बशर्ते उसे केवल नए सौंदर्य या नए उपकरणों के प्रदर्शन तक सीमित न रखा जाए। यदि आप किसी शताब्दी पुरानी संरचना पर आधुनिक तकनीक का बोझ डाल रहे हैं, तो उसके लिए सबसे पहले पूरे ढांचे तथा पिलर्स की भार वहन क्षमता का व्यापक जियोलॉजिकल, हाइड्रोलॉजिकल और स्ट्रक्चरल सेफ्टी ऑडिट होना अनिवार्य है। यदि मूल पिलर्स और नींव नए दबाव को सहने में असमर्थ हैं, तो केवल गेट बदल देने से ढांचा सुरक्षित नहीं हो जाता। भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं से बचने के लिए आवश्यक है कि जीर्णोद्धार की योजनाओं में उपकरणों के आधुनिकीकरण से ज्यादा प्राथमिकता पिलर्स और बुनियादी ढांचे की मजबूती को दी जाए। जब तक पुराने सिविल स्ट्रक्चर की मजबूती को नए उपकरणों की क्षमता के बराबर नहीं लाया जाता, तब तक रेनोवेशन का कोई भी प्रयास विकास के बजाय एक बड़े खतरे को ही निमंत्रण देता रहेगा।

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