रामपुर जनपद को औद्योगिक तरक्की की नई राह पर ले जाने के दावों के बीच चमरौआ ब्लॉक क्षेत्र अचानक सुर्खियों में आ गया है। प्रशासनिक गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, इस क्षेत्र में एक विशाल इंडस्ट्रियल हब स्थापित करने की योजना पर अंदरखाने काम चल रहा है। चर्चा है कि जिला प्रशासन ने इस प्रस्तावित प्रोजेक्ट के लिए जरूरी जमीनों का चिह्नांकन पूरा कर लिया है और इसकी विस्तृत रिपोर्ट शासन को भेज दी है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम पर जिम्मेदार अधिकारियों ने अभी पूरी तरह खामोशी साध रखी है। किसी भी स्तर से अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन सूत्रों के हवाले से उड़ी इस सुगबुगाहट ने इलाके के सियासी और व्यावसायिक पारे को बढ़ा दिया है।
बेरोजगारी का दंश झेल रहे इस जिले में बीते तीन-चार वर्षों के दौरान कई नई औद्योगिक इकाइयां स्थापित हुई हैं। शासन स्तर पर वित्त मंत्री के विशेष फोकस के चलते रामपुर में औद्योगिक माहौल तैयार होने लगा है। आंकड़ों की मानें तो आने वाले दिनों में जिले के अंदर 748 नई औद्योगिक इकाइयां शुरू होने की संभावना है। इसके लिए स्थानीय प्रशासन को कुल 8560.55 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों के एमओयू प्राप्त हो चुके हैं। यदि ये सभी प्रस्ताव धरातल पर उतरते हैं तो इनसे लगभग 43,145 लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार मिल सकेगा।
औद्योगिक विकास की इस नई आहट के बीच चमरौआ और उसके आसपास के इलाकों में रियल एस्टेट से जुड़े लोगों की हलचल तेज हो गई है। स्थानीय नेताओं, प्रापर्टी डीलरों और भू-माफियाओं के गिरोह इस संभावित औद्योगिक केंद्र के मुहाने पर पड़ने वाली जमीनों पर नजरें गड़ाए बैठे हैं। सीधे-साधे ग्रामीण किसानों को गुमराह करके या अग्रिम राशि का लालच देकर उनकी उपजाऊ जमीनों को औने-पौने दामों में हथियाने का खेल शुरू हो चुका है। चर्चा इस बात की भी है कि कई रसूखदार लोगों ने बेनामी संपत्तियों के जरिए बड़े पैमाने पर जमीनों के सौदे पक्के करने शुरू कर दिए हैं।
इस पूरे सट्टेबाजी के खेल के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े फायदे देखे जा रहे हैं। पहला गणित सरकारी अधिग्रहण के वक्त मिलने वाले भारी-भरकम मुआवजे का है। नए नियमों के तहत औद्योगिक विकास के लिए ली जाने वाली जमीनों पर किसानों को बाजार दर से कई गुना अधिक मुआवजा दिया जाता है। प्रापर्टी डीलर और नेता सस्ते में जमीन खरीदकर सरकारी खजाने से बड़ा मुनाफा कमाने की फिराक में हैं। दूसरी वजह इस क्षेत्र की कमर्शियल वैल्यू है। हब बनने के बाद आसपास ढाबे, होटल, लॉजिस्टिक्स यार्ड और रिहायशी कॉलोनियों की मांग बढ़ेगी, जिससे जमीनों की कीमतें रातों-रात आसमान छूने लगेंगी।
लोकेशन के लिहाज से चमरौआ ब्लॉक को इस परियोजना के लिए बेहद मुफीद माना जा रहा है। दिल्ली और आसपास के प्रमुख शहरों से बेहतर सड़क कनेक्टिविटी होने के कारण यहां माल की आवाजाही आसान रहेगी। यदि यह प्रोजेक्ट कागजों से निकलकर धरातल पर उतरता है, तो इससे जिले में लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण क्षेत्र को नई ऊर्जा मिलेगी। लेकिन फिलहाल इस संभावना पर सट्टेबाजी का साया गहराता दिख रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा जोखिम क्षेत्र के छोटे और सीमांत किसानों पर मंडरा रहा है। सही और आधिकारिक जानकारी न होने के कारण ग्रामीण प्रापर्टी डीलरों के बिछाए जाल में फंस रहे हैं। जानकारों का कहना है कि जब तक शासन की ओर से आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं होती, तब तक जमीनों के सटीक गाटा नंबर स्पष्ट नहीं होंगे। ऐसे में जल्दबाजी में अपनी जमीनें बेचने वाले किसान भविष्य के बड़े फायदे से वंचित रह सकते हैं। फिलहाल सभी की निगाहें शासन के अगले कदम और प्रशासन की आधिकारिक घोषणा पर टिकी हुई हैं।
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