देश के आम उपभोक्ताओं के लिए राहत के दिन फिलहाल खत्म होते नजर आ रहे हैं। सरकारी तेल कंपनियों ने एक बार फिर आम जनता की जेब पर बड़ा हमला बोला है। पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में की गई ताजा बढ़ोतरी ने लोगों की चिंताएं काफी बढ़ा दी हैं। इस बार पेट्रोल के दामों में 87 पैसे प्रति लीटर और डीजल में 90 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि यह बदलाव कोई इकलौता झटका नहीं है, बल्कि एक ही हफ्ते के भीतर आम जनता को मिला यह दूसरा बड़ा झटका है। इससे पहले तेल कंपनियों ने एकमुश्त कार्रवाई करते हुए दोनों ईंधनों के दामों में सीधे तीन रुपये प्रति लीटर की भारी बढ़ोतरी की थी। चंद दिनों के भीतर दो बार हुए इस मूल्य संशोधन के कारण देश के कई हिस्सों में ईंधन की कीमतें अपने पुराने रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गई हैं।

एक हफ्ते में दो बड़े झटके और चौतरफा दबाव
ईंधन की कीमतों में इस तरह का लगातार हो रहा बदलाव आम आदमी के घरेलू बजट को पूरी तरह से तहस-नहस करने की ताकत रखता है। एक हफ्ते से भी कम समय में कुल मिलाकर पेट्रोल और डीजल के दाम करीब चार रुपये प्रति लीटर तक महंगे हो चुके हैं। इस दोहरे झटके के कारण परिवहन क्षेत्र में काम करने वाले लोगों और रोजाना सफर करने वाले नौकरीपेशा वर्ग में भारी नाराजगी देखी जा रही है। वाहन मालिकों का कहना है कि जब एक बार में ही तीन रुपये बढ़ाए गए थे, तभी मासिक खर्च का संतुलन बिगड़ गया था और अब इस दूसरी बढ़ोतरी ने मुश्किलें और ज्यादा बढ़ा दी हैं। बाजार के जानकारों का कहना है कि इस तरह के लगातार फैसलों से बाजार में अनिश्चितता का माहौल बनता है, जिससे रोजमर्रा की जरूरी चीजों की जमाखोरी और उनके दाम बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है।
तेल कंपनियों का रुख और घाटे की भरपाई
सरकारी तेल विपणन कंपनियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जो अप्रत्याशित उछाल आया है, उसकी वजह से उनके पास कीमतों को बढ़ाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक संकट और प्रमुख समुद्री व्यापारिक मार्गों में पैदा हुए अवरोधों के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति पर बहुत बुरा असर पड़ा है। भारत अपनी जरूरत का तकरीबन अस्सी फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, इसलिए वैश्विक बाजार की हर छोटी-बड़ी हलचल का सीधा असर यहां देखने को मिलता है। तेल कंपनियों के अधिकारियों के मुताबिक, वे पिछले काफी समय से अंतरराष्ट्रीय बाजार के बढ़े हुए दामों का बोझ खुद उठा रहे थे, जिससे उन्हें भारी परिचालन घाटा हो रहा था। इस घाटे को कम करने और अपनी वित्तीय स्थिति को संतुलित रखने के लिए वे अब धीरे-धीरे बढ़ी हुई कीमतों को उपभोक्ताओं पर डाल रहे हैं।
लगातार बढ़ती कीमतों का अर्थव्यवस्था पर असर
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि ईंधन के दामों में इस तरह की लगातार बढ़ोतरी का असर बहुत गहरा होता है। डीजल के दाम बढ़ने से कृषि क्षेत्र और माल ढुलाई की लागत में तुरंत इजाफा हो जाता है। जब ट्रकों का किराया बढ़ता है, तो मंडियों में आने वाली हरी सब्जियां, फल, अनाज और डेयरी उत्पाद अपने आप महंगे हो जाते हैं। इसके कारण आने वाले महीनों में देश की खुदरा महंगाई दर में भी तेज उछाल आने की आशंका जताई जा रही है। उपभोक्ता संगठनों और व्यापारी संघों ने सरकार से गुहार लगाई है कि वह इस मामले में तुरंत दखल दे। लोगों की मांग है कि केंद्र और राज्य सरकारें अपने हिस्से के टैक्स और वैट में कटौती करें ताकि आम जनता को इस दोहरी मार से कुछ राहत मिल सके, क्योंकि लगातार बढ़ते दाम देश के मध्यम और निचले वर्ग की क्रय शक्ति को कमजोर कर रहे हैं।
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