राजस्थान के अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। 8 मई 2026 को हुई एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान अजमेर की सिविल कोर्ट ने इस मामले के कानूनी दायरे को विस्तार दिया है। अदालत ने दरगाह दीवान के कार्यालय और खादिमों की दोनों प्रमुख संस्थाओं यानी अंजुमन कमेटी को आधिकारिक तौर पर इस केस में प्रतिवादी बनाने की अनुमति दे दी है। इसके अलावा महाराणा प्रताप सेना के अध्यक्ष और कुछ अन्य व्यक्तियों को भी वादी के रूप में शामिल किया गया है। कोर्ट का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब दरगाह का प्रबंधन संभालने वाले सभी प्रमुख पक्ष इस कानूनी लड़ाई का हिस्सा बन गए हैं। हालांकि, अदालत ने उन आवेदनों पर सख्ती भी दिखाई है जो बिना ठोस आधार के पक्षकार बनना चाहते थे और ऐसे नौ आवेदकों पर जुर्माना भी लगाया गया है।
नवंबर 2024 से अब तक की कानूनी स्थिति
यह मामला पहली बार 2024 के अंत में तब चर्चा में आया था जब हिंदू सेना ने पहली याचिका दायर की थी। उस समय इसे केवल एक नया दावा माना जा रहा था, लेकिन पिछले डेढ़ साल में इस मामले में कई मोड़ आए हैं। याचिकाकर्ता विष्णु गुप्ता और अन्य सहयोगियों का मुख्य तर्क यह है कि दरगाह परिसर के नीचे संकट मोचन महादेव मंदिर के अवशेष मौजूद हैं। उनका दावा राजस्व रिकॉर्ड और ऐतिहासिक वास्तुकला के कुछ विशेष चिह्नों पर आधारित है। दूसरी ओर दरगाह कमेटी और मुस्लिम पक्ष ने इन दावों को पूरी तरह से काल्पनिक करार दिया है। वर्तमान में स्थिति यह है कि कोर्ट ने प्राथमिक आपत्तियों और पक्षकारों के चयन की प्रक्रिया को लगभग पूरा कर लिया है। अब अगली सुनवाई में मामले की योग्यता और साक्ष्यों पर बहस होने की उम्मीद है।
सांप्रदायिक सद्भाव और प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट की चुनौती
अजमेर दरगाह को लेकर छिड़ी इस कानूनी बहस ने धार्मिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। दरगाह के खादिमों और दीवान पक्ष का कहना है कि यह स्थान सदियों से हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल रहा है। उन्होंने अदालत के समक्ष दलील दी है कि इस तरह की याचिकाएं 1991 के प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट का सीधा उल्लंघन हैं। यह कानून आजादी के समय के धार्मिक स्थलों की स्थिति को बनाए रखने की गारंटी देता है। हालांकि, हिंदू पक्ष के वकीलों का तर्क है कि यदि किसी स्थान के मूल स्वरूप को छिपाया गया है, तो उसकी सच्चाई सामने आना जरूरी है। अदालती कार्यवाही के दौरान ज्ञानवापी और भोजशाला जैसे मामलों का संदर्भ भी दिया जा रहा है, जिससे यह विवाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।
एएसआई सर्वे की मांग और प्रशासन की सतर्कता
हिंदू पक्ष की ओर से लगातार यह मांग की जा रही है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई के माध्यम से पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए। उनका मानना है कि सर्वे ही वह एकमात्र तरीका है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि मुख्य ढांचे के नीचे प्राचीन मंदिर की दीवारें या मूर्तियां हैं या नहीं। कोर्ट ने इस मांग पर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है, लेकिन दरगाह कमेटी को अपना पक्ष मजबूती से रखने का निर्देश दिया है। इस संवेदनशील मामले को देखते हुए अजमेर जिला प्रशासन भी पूरी तरह सतर्क है। दरगाह में आने वाले जायरीनों की सुरक्षा और शहर के शांतिपूर्ण माहौल को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। 22 जुलाई की सुनवाई इस लिहाज से काफी अहम होने वाली है क्योंकि तब अदालत 7/11 की अर्जी पर अपनी कार्यवाही आगे बढ़ाएगी।
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