​पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 जिलों में एक बार फिर आंदोलन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। हाल ही में वकीलों की हड़ताल और बाजारों के बंद ने शासन-प्रशासन को यह याद दिला दिया है कि 1955 से चली आ रही यह मांग अब भी उतनी ही प्रखर है।

दूरी का गणित: पाकिस्तान करीब, अपना हाई कोर्ट दूर

​आंदोलनकारी वकीलों का सबसे बड़ा तर्क भौगोलिक दूरी है। मेरठ से प्रयागराज की दूरी लगभग 700 किलोमीटर है। इसके विपरीत, मेरठ से पाकिस्तान की सीमा और लाहौर हाई कोर्ट की दूरी महज 435 किलोमीटर के आसपास बैठती है।

  • समस्या: एक गरीब वादी (मुकदमा लड़ने वाला) को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों (जैसे सहारनपुर, शामली, मेरठ) से प्रयागराज जाने-आने में न केवल 24-30 घंटे का समय लगता है, बल्कि आर्थिक बोझ भी दोगुना हो जाता है।
  • तर्क: वकीलों का कहना है कि जब उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्यों के पास अपने हाई कोर्ट हो सकते हैं, तो 8 करोड़ की आबादी वाले पश्चिमी यूपी को एक बेंच क्यों नहीं मिल सकती?
सियासी समर्थन और फाइलों में दबी मांग

​यह मुद्दा राजनीतिक गलियारों में हमेशा चर्चा में रहा है, लेकिन कभी जमीन पर नहीं उतरा। उत्तर प्रदेश के कई कद्दावर मुख्यमंत्रियों ने समय-समय पर इसका समर्थन किया है:

  1. संपूर्णानंद और एन.डी. तिवारी: शुरुआती दशकों में इन्होंने प्रशासनिक सुगमता के लिए बेंच की वकालत की।
  2. मायावती: बसपा सरकार के दौरान मायावती ने न केवल बेंच का समर्थन किया, बल्कि पश्चिम यूपी को अलग राज्य (हरित प्रदेश) बनाने का प्रस्ताव भी विधानसभा से पास कराया था।
  3. जसवंत सिंह आयोग (1985): केंद्र सरकार द्वारा गठित इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में पश्चिमी यूपी में हाई कोर्ट की बेंच स्थापित करने की सिफारिश की थी, लेकिन यह रिपोर्ट दशकों से धूल फांक रही है।
विवाद का केंद्र: बेंच कहां बने?

​मांग पूरी न होने का एक बड़ा कारण 'शहरों की आपसी खींचतान' भी रही है।


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  • ​मेरठ के वकील मेरठ में बेंच चाहते हैं।
  • ​आगरा के वकील अपने पुराने इतिहास का हवाला देकर वहां बेंच की मांग करते हैं।
  • ​गाजियाबाद और नोएडा भी अपनी आधुनिक सुविधाओं के कारण रेस में बने रहते हैं। इसी आपसी मतभेद का फायदा उठाकर राजनीतिक दल इस निर्णय को टालते रहे हैं।
मौजूदा स्थिति और प्रभाव
  • न्यायिक बोझ: इलाहाबाद हाई कोर्ट दुनिया के सबसे बड़े हाई कोर्ट्स में से एक है, जहां लंबित मुकदमों की संख्या लाखों में है। बेंच बनने से इस बोझ में कमी आएगी।
  • आर्थिक नुकसान: हड़ताल के कारण करोड़ों रुपये का राजस्व प्रभावित होता है और आम जनता के न्यायिक कार्य रुक जाते हैं।

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