सिख इतिहास का एक और अमर नाम है— मोती राम मेहरा। मोती राम मेहरा कई वर्षों तक सरहिंद के फौजदार नवाब वजीर खान की रसोई में हिंदू कैदियों को रोटी और पानी देने का काम करते थे। जब गुरु गोविंद सिंह जी की माता (माता गुजरी) और उनके दो छोटे साहिबजादों को कड़ाके की ठंड में एक खुले बुर्ज (ठंडा बुर्ज) में कैद किया गया, तो मोती राम उन्हें रोटी देने गए। लेकिन माता गुजरी ने 'म्लेच्छ' की रसोई की रोटी खाने से इनकार कर दिया।
वे तीनों कई दिनों से भूखे थे। मोती राम से यह स्थिति देखी नहीं गई। घर जाकर उन्होंने अपनी पत्नी को माता जी और बच्चों के बारे में बताया। नवाब के सैनिक हर समय पहरे पर रहते थे और बाहर से कुछ भी पहुँचाना असंभव था। तब उनकी पत्नी ने अपने कुछ गहने दिए। रात के समय मोती राम दूध और गिलास लेकर बुर्ज की ओर गए, पहरेदारों को गहनों की रिश्वत दी और अंदर पहुँचने में सफल रहे। माता गुजरी ने वह दूध पिया और बच्चों को भी पिलाया। यह क्रम तीन दिनों तक चला। मोती राम और उनकी पत्नी ने नवाब के संभावित खतरों को जानते हुए भी यह सेवा की।
इस बात का खुलासा दोनों साहिबजादों की शहादत के बाद हुआ। जब वजीर खान को पता चला कि इन कैदियों ने एक दिन भी उसके घर की रोटी नहीं खाई, तो उसने मोती राम और उनकी पत्नी को पकड़ लिया। मोती राम ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। दंडस्वरूप पति-पत्नी दोनों को कोल्हू में पिलवा दिया गया। उनका विवाह अभी कुछ ही साल पहले हुआ था।
सबसे महंगी जमीन
सरहिंद के सेठ दीवान टोडरमल ने मुँह मांगी कीमत चुकाकर वह जमीन खरीदी और माता गुजरी व दोनों साहिबजादों का अंतिम संस्कार किया। सिख इतिहास के अनुसार, यह अब तक का सबसे महंगा जमीन का सौदा है।
शर्त यह रखी गई थी कि जमीन के जितने हिस्से पर सोने की मुहरें बिछाई जाएंगी, उतनी ही जमीन दी जाएगी। जब मुहरें कम पड़ने लगीं, तो टोडरमल की पत्नी ने भी अपने गहने बेच दिए। अंततः जमीन पर सोने की मुहरें बिछाकर उसे खरीदा गया। कहा जाता है कि मात्र चार वर्ग मीटर की उस जमीन के लिए अठारह हजार सोने की मुहरें चुकाई गई थीं।
इस घटना के पांच साल बाद, बाबा बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में सिखों ने 80 वर्षीय वजीर खान को मार डाला, उसके महल को लूटा और उसे आग के हवाले कर दिया। बाबा बंदा सिंह बहादुर ने सुच्चा नंद खत्री का भी वही हश्र किया, जिसने गुरु के बच्चों को 'सपोले' कहकर नवाब को उकसाया था।
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