देशभर में बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) की लगातार हो रही मौतें और आत्महत्याएं आज एक गहन राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गई हैं। इन त्रासदियों को सीधे तौर पर 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) यानी मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण अभियान से जुड़े अत्यधिक कार्यभार, कम समय सीमा और प्रशासनिक सख्ती के कारण उपजे मानसिक तनाव से जोड़ा जा रहा है।

एक तरफ, विपक्ष इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर हमलावर है और आरोप लगा रहा है कि सरकार इस गंभीर विषय पर संसद या अन्य सार्वजनिक मंचों पर विस्तृत चर्चा से भाग रही है, वहीं दूसरी तरफ, चुनाव आयोग और सत्ता पक्ष अपनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए इन आरोपों को निराधार बता रहे हैं।

विपक्ष का दावा: 'सरकारी हत्या' और मुआवजे की मांग

​विपक्षी दलों, विशेष रूप से तृणमूल कांग्रेस (TMC) और कांग्रेस ने इस घटनाक्रम को एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए इसे 'सरकारी नाकामी' और यहां तक कि 'सरकारी हत्या' करार दिया है। विपक्षी नेताओं का दावा है कि चुनाव आयोग ने बिना पूरी तैयारी और पर्याप्त संसाधनों के आनन-फानन में SIR अभियान की शुरुआत कर दी।


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उनका तर्क है कि जो कार्य तीन महीने में सहजता से पूरा किया जा सकता था, उसे अत्यंत सीमित समय सीमा में पूरा करने के लिए BLO पर अमानवीय दबाव बनाया जा रहा है। चूंकि बीएलओ की एक बड़ी संख्या सरकारी शिक्षकों की है, इसलिए उन्हें अपने शैक्षणिक कार्य और मतदाता सूची के कार्य को एक साथ साधने के दोहरे दबाव का सामना करना पड़ रहा है। इसी दबाव और प्रशासनिक अधिकारियों की लगातार सख्ती के कारण कई बीएलओ गंभीर मानसिक तनाव में हैं, जिससे आत्महत्याएँ भी हो रही हैं।

TMC ने मुखर रूप से यह दावा किया है कि अकेले पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के कारण चालीस से अधिक लोगों की मौत हुई है। विपक्ष ने मांग की है कि मृतक बीएलओ के परिजनों को कम से कम एक करोड़ रुपये का पर्याप्त मुआवजा दिया जाए और उनके परिवार के एक सदस्य को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी प्रदान की जाए।

 सरकार और चुनाव आयोग का बचाव: आरोपों को बताया निराधार

​सत्ता पक्ष और चुनाव आयोग (EC) ने विपक्ष द्वारा लगाए गए इन गंभीर आरोपों को पूरी तरह से निराधार बताते हुए खारिज कर दिया है। चुनाव आयोग ने BLO की मौतों और आत्महत्या की घटनाओं को सीधे तौर पर काम के दबाव से जोड़े जाने पर आश्चर्य व्यक्त किया है और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश की है।

आयोग ने तत्काल कदम उठाते हुए सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारियों (सीईओ) से इस संबंध में विस्तृत तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है। चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण यह है कि जब वर्कलोड बढ़ा, तब राज्यों को अतिरिक्त जनशक्ति (Additional Manpower) प्रदान करने के लिए निर्देश दिया गया था, लेकिन आयोग का आरोप है कि कुछ राज्य सरकारों ने इन निर्देशों का पालन नहीं किया या उन्हें अस्वीकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप सारा बोझ मौजूदा बीएलओ पर आ पड़ा। इस तरह, सरकारें अब बीएलओ के कार्यभार की जिम्मेदारी सीधे राज्य सरकारों पर डाल रही हैं।

न्यायिक हस्तक्षेप: सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की कार्रवाई

​इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी बढ़ने के बाद, न केवल चुनाव आयोग को, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत को भी हस्तक्षेप करना पड़ा। अभिनेता विजय की पार्टी द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने BLO की कार्य स्थितियों पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की। न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि चुनावी कार्य के लिए तैनाती एक कानूनी प्रक्रिया है, और यह सुनिश्चित करना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि पर्याप्त जनशक्ति उपलब्ध हो ताकि मौजूदा कर्मचारियों पर कार्यभार कम हो सके।

कोर्ट ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे अतिरिक्त स्टाफ तुरंत तैनात करें और बीएलओ का कार्यभार समान रूप से वितरित करें। सबसे महत्वपूर्ण निर्देश यह था कि जिन बीएलओ के पास ड्यूटी से छूट मांगने की पर्याप्त वजह है, उन्हें राहत या छुट्टी प्रदान की जानी चाहिए, जिससे मानसिक तनाव को कम किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों के बाद, राज्य सरकारों पर बीएलओ के काम के बोझ को कम करने और उनकी कार्य परिस्थितियों में सुधार करने का दबाव काफी बढ़ गया है।

इस संकट के निहितार्थ और आगे की राह

​BLO की मौत का यह दुर्भाग्यपूर्ण मुद्दा SIR जैसे बड़े राष्ट्रीय अभियानों के दौरान जमीनी स्तर के स्टाफ पर पड़ने वाले भयानक दबाव को रेखांकित करता है। एक ओर, विपक्ष इन मौतों को सीधे तौर पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग की दबावपूर्ण और संवेदनहीन कार्यप्रणाली का परिणाम बताकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर, सरकारें और चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज कर रहे हैं और कार्यभार कम न करने के लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने इस मामले की गंभीरता पर एक आधिकारिक मुहर लगा दी है, और अब गेंद राज्य सरकारों के पाले में है कि वे कर्मचारियों के स्वास्थ्य और कार्य-कल्याण (Work-Welfare) को सुनिश्चित करें। हालांकि, इस राष्ट्रीय संकट पर सरकार द्वारा संसद जैसे बड़े मंचों पर खुली और विस्तृत चर्चा से बचने की धारणा अभी भी बनी हुई है, जिसने राजनीतिक गलियारों में इस संकट को और गहरा कर दिया है।

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