प्रयागराज की पावन रेती पर जो कुछ भी हुआ, वह भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा के समर्थकों के लिए गहरी चिंता का विषय है। जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिविर में जिस तरह से भीड़ घुसी और वहां धक्का-मुक्की हुई, वह सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है। संगम का तट वैचारिक मंथन और आत्मिक शांति के लिए जाना जाता है, न कि राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के लिए। संतों के बीच मतभेद होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन उन मतभेदों को सुलझाने का माध्यम शास्त्रार्थ होता है, न कि भीड़तंत्र। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब राजनीति की दूषित हवा धर्म के उच्चतम केंद्रों तक पहुंच चुकी है, जहां मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को सरेआम लांघा जा रहा है।

'बुलडोजर बाबा' के नारों की दहशत

​इस पूरे घटनाक्रम में सबसे विवादास्पद तत्व 'बुलडोजर बाबा' और 'मुख्यमंत्री योगी जिंदाबाद' के नारे रहे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का 'बुलडोजर' वाला स्वरूप अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई का प्रतीक माना जाता है, लेकिन उसी प्रतीक का उपयोग एक धार्मिक शिविर के भीतर शंकराचार्य को चुनौती देने के लिए करना बेहद आपत्तिजनक है। यह न केवल मुख्यमंत्री की छवि को विवादों में घसीटने जैसा है, बल्कि यह एक खतरनाक संदेश भी देता है कि भीड़ अब सत्ता के नाम पर किसी भी धार्मिक संस्था की स्वायत्तता को कुचल सकती है। क्या 'बुलडोजर' अब केवल न्याय का औजार नहीं रहा, बल्कि विरोधियों को डराने-धमकाने का एक राजनीतिक हथियार बन गया है? इस प्रश्न पर सत्ता और समाज दोनों को मंथन करने की आवश्यकता है।


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सुरक्षा की विफलता और बढ़ता अविश्वास

​शंकराचार्य के शिष्यों द्वारा जान के खतरे का दावा करना और शिविर में 12 सीसीटीवी कैमरे लगाना इस बात का प्रमाण है कि उनका स्थानीय प्रशासन से भरोसा पूरी तरह उठ चुका है। जब एक शीर्ष धर्मगुरु को अपनी रक्षा के लिए खुद मोर्चा संभालना पड़े, तो यह शासन की विफलता मानी जानी चाहिए। मेले की हाई-टेक सुरक्षा व्यवस्था उस समय कहां थी जब उपद्रवी अंदर घुसकर नारेबाजी कर रहे थे? प्रशासन का यह मौन और ढुलमुल रवैया संदेह पैदा करता है कि क्या इन तत्वों को किसी का मौन संरक्षण प्राप्त है? यदि समय रहते इन अराजक तत्वों को चिन्हित कर सजा नहीं दी गई, तो भविष्य में किसी भी संत या विद्वान की सुरक्षा सुनिश्चित करना असंभव हो जाएगा।

मर्यादाओं की रक्षा अब अनिवार्य

​धर्म और राजनीति का संगम हमेशा से संवेदनशील रहा है, लेकिन जब राजनीति धर्म पर हावी होने लगे तो समाज का संतुलन बिगड़ जाता है। शंकराचार्य पद की अपनी एक ऐतिहासिक और धार्मिक गरिमा है, जिसे किसी भी राजनीतिक नारे या विचारधारा के अधीन नहीं किया जा सकता। प्रयागराज की यह घटना आगामी महाकुंभ के लिए एक चेतावनी है। यदि हम आज एक शंकराचार्य के शिविर की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित नहीं कर सकते, तो करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा कैसे करेंगे? यह समय केवल दोषियों को पकड़ने का नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि राजनीति के 'बुलडोजर' आध्यात्मिक क्षेत्रों की शांति और मर्यादा को न रौंदें।

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