बांग्लादेश के मैमनसिंह जिले से आई एक तस्वीर ने मानवता के कलेजे को छलनी कर दिया है। मजहबी जुनून में अंधी हुई भीड़ ने एक हिंदू मजदूर, दीपू चंद्र दास को न केवल बेदर्दी से मौत के घाट उतार दिया, बल्कि उनके शव को पेड़ से बांधकर सरेआम आग के हवाले कर दिया। ईशनिंदा के एक संदिग्ध और कथित आरोप पर 'अल्लाह-हू-अकबर' के नारों के साथ इस कृत्य को अंजाम देना यह साफ करता है कि वहां कानून का नहीं, बल्कि कट्टरपंथी हुजूम का शासन चल रहा है। दीपू की जलती हुई देह उस 'नए बांग्लादेश' के दावों की पोल खोल रही है, जहाँ लोकतंत्र और समानता के नाम पर केवल एक विशेष विचारधारा का तांडव दिखाई दे रहा है।
कट्टरता: समाज को खोखला करता असाध्य कैंसर
यह स्वीकार करने का समय आ गया है कि कट्टरता एक ऐसा अभिशाप है, जो चाहे मुस्लिम समाज में हो या हिंदू-सिख समाज में—वह अंततः विनाश ही लाती है। कट्टरता किसी धर्म का हिस्सा नहीं, बल्कि उस धर्म के गलत इस्तेमाल का परिणाम है। जहाँ धार्मिक उन्माद देश प्रेम और आपसी भाईचारे को रौंदते हुए आगे बढ़ता है, वहीं से सभ्य समाज के सपने का पतन शुरू हो जाता है। बांग्लादेश की यह 'मॉब लिंचिंग' उस बर्बरता का प्रतीक है, जहाँ भीड़ ही जज, जूरी और जल्लाद बन जाती है।
अक्सर कट्टरपंथी तत्व अपनी हिंसा को सही ठहराने के लिए इतिहास के पन्नों का सहारा लेते हैं। वे खुद को पीड़ित बताकर प्रतिशोध की आग भड़काते हैं। लेकिन यदि इतिहास के घावों को ही वर्तमान में नफरत का आधार बनाया जाए, तो फिर सिख समाज को अपने साथ हुए अत्याचारों को कभी नहीं भूलना चाहिए था। गुरुओं के बलिदान से लेकर विभाजन और 1984 के दंगों तक, सिख समाज ने अकल्पनीय पीड़ा सही है। लेकिन उन्होंने नफरत के बजाय 'सरबत दा भला' (सबका भला) और राष्ट्र निर्माण का मार्ग चुना। यह मिसाल है कि इतिहास से सीखा जाता है, उससे नफरत की खेती नहीं की जाती।
भारत बनाम पड़ोसी: सम्मान के बदले विश्वासघात क्यों?
भारत और उसके पड़ोसी मुल्कों के बीच का विरोधाभास आज पूरी दुनिया के सामने है। भारत ने अपने संविधान में अल्पसंख्यकों को वे अधिकार दिए हैं, जो दुनिया के कई विकसित देशों में भी दुर्लभ हैं। यहाँ मुसलमानों को राष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश और सेना के शीर्ष पदों तक पहुंचने का समान अवसर मिला। लेकिन विडंबना देखिए कि इस सम्मानजनक जीवन और स्वतंत्रता के बावजूद, कुछ तत्वों के मन में अपने ही देश के प्रति घृणा और 'जिहादी' मानसिकता का पनपना समझ से परे है।
जब ये तत्व सीमा पार की कट्टरपंथी विचारधारा से प्रेरित होकर 'जिहाद' को बढ़ावा देते हैं, तो वे केवल अपने देश के साथ गद्दारी नहीं करते, बल्कि उस पूरे समाज को कटघरे में खड़ा कर देते हैं जिसके वे हिस्सा हैं। यह सच है कि कट्टरपंथी संख्या में 'दहाई' तक ही होते हैं, लेकिन उनकी हिंसक आक्रामकता और सिस्टम को बंधक बनाने की क्षमता पूरे देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन जाती है।
वैश्विक संस्थाओं का 'सिलेक्टिव' विलाप और खौफनाक मौन
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे शर्मनाक भूमिका संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोगों की रही है। जब दुनिया के किसी अन्य कोने में किसी विशेष समुदाय पर आंच आती है, तो न्यूयॉर्क से जिनेवा तक निंदा प्रस्तावों की बाढ़ आ जाती है। लेकिन जब बांग्लादेश में हिंदुओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया जाता है, तो इन संस्थाओं के दफ्तरों में सन्नाटा पसर जाता है।
क्या मानवाधिकारों की परिभाषा मजहब देखकर तय की जाएगी? दीपू चंद्र दास की जलती हुई देह उन वैश्विक संगठनों से सवाल पूछ रही है कि उनकी 'अंतरात्मा' हिंदुओं के नरसंहार पर क्यों नहीं जागती? यह 'चुनिंदा संवेदनशीलता' कट्टरपंथियों को यह संदेश देती है कि वे अल्पसंख्यकों के साथ कुछ भी करें, दुनिया उनका कुछ नहीं बिगाड़ेगी। यह मौन उन दरिंदों को मूक सहमति देने जैसा है।
हिंदुत्व का जागरण और भविष्य की चुनौती
वर्षों तक 'अति-सहिष्णुता' का परिचय देने के बाद अब हिंदू समाज का आक्रोशित होना स्वाभाविक है। जब एक समुदाय निरंतर अपने भाइयों को जलते हुए और अपनी जड़ों को उखड़ते हुए देखता है, तो आत्मरक्षा के लिए संगठित होना उसका मौलिक अधिकार बन जाता है। इसे 'नफरत' कहना गलत होगा; यह वास्तव में 'अस्तित्व की पुकार' है। सावरकर ने ठीक ही कहा था कि शांति केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि सामर्थ्य से आती है।
निर्णायक समय
अब समय आ गया है कि छद्म धर्मनिरपेक्षता का चश्मा उतारकर उस 'जिहादी मानसिकता' को पहचाना जाए जो इंसानियत की दुश्मन है। बांग्लादेश की घटना एक चेतावनी है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के आश्वासन तब तक बेमानी हैं, जब तक कि दोषियों को चौराहे पर दंडित नहीं किया जाता। यदि आज विश्व समुदाय और भारत का प्रबुद्ध समाज इस कट्टरता के खिलाफ एकजुट नहीं हुआ, तो यह मजहबी आग कल सबके दरवाजों तक पहुंचेगी। कट्टरता का इलाज केवल कड़ी निंदा नहीं, बल्कि कठोर न्याय और वैचारिक स्पष्टता है।
इंसानियत और मजहब के बीच जब मजहब हथियार बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि विनाश निकट है। अब समय केवल देखने का नहीं, बल्कि सत्य के पक्ष में खड़े होने का है।
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