उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर के शक्तिफार्म का रहने वाला 30 वर्षीय राकेश कुमार 8 अगस्त 2025 को सुनहरे भविष्य की उम्मीद लिए रूस रवाना हुआ था। महज चार महीने बाद, 17 दिसंबर को उसका शव एक ताबूत में लिपटकर वापस लौटा। यह कहानी केवल राकेश की नहीं है, बल्कि राजस्थान के बीकानेर के अजय गोदारा और उन तमाम भारतीय युवाओं की है, जो विदेश में पढ़ाई या नौकरी के नाम पर 'मानव ढाल' (Human Shield) बनाए जा रहे हैं।
धोखाधड़ी का खतरनाक जाल
राकेश और अजय, दोनों के मामलों में एक ही पैटर्न नजर आता है, धोखाधड़ी। राकेश स्टडी वीजा पर गया था, लेकिन 30 अगस्त को उसने अपने भाई दीपू मौर्य को बताया कि उसे जबरन सैन्य ट्रेनिंग दी जा रही है। वहीं, अजय गोदारा को किचन स्टाफ की नौकरी का लालच देकर रूसी सेना में धकेल दिया गया। इन युवाओं के पासपोर्ट छीन लिए जाते हैं और इन्हें जबरन ऐसे युद्ध के मोर्चे पर खड़ा कर दिया जाता है, जिससे इनका कोई लेना-देना नहीं है।
परिजनों की खामोशी और सिस्टम का डर
हैरानी की बात यह है कि राकेश के अंतिम संस्कार के वक्त परिजनों ने मीडिया से दूरी बनाए रखी और प्रशासन भी मौत के कारणों पर चुप्पी साधे रहा। यह खामोशी एक गहरे डर या किसी कूटनीतिक दबाव की ओर इशारा करती है। जब एक भारतीय नागरिक की विदेशी जमीन पर संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होती है, तो क्या उसके परिवार को सच जानने का हक नहीं है?
मुख्य चिंता के बिंदु:
- वीजा नियमों का उल्लंघन: स्टडी वीजा पर गए छात्रों को सैन्य गतिविधियों में झोंकना अंतरराष्ट्रीय नियमों का खुला उल्लंघन है।
- एजेंटों का नेटवर्क: भारत में सक्रिय उन अवैध एजेंटों पर लगाम क्यों नहीं कसी जा रही, जो युवाओं को ऊंचे वेतन का झांसा देकर युद्ध क्षेत्र में भेज रहे हैं?
- सुरक्षा तंत्र की विफलता: अजय गोदारा ने वीडियो जारी कर मदद मांगी थी, राकेश के भाई ने 5 सितंबर को विदेश मंत्रालय को ईमेल भेजा था। सवाल यह है कि क्या हमारी सरकार की प्रतिक्रिया की गति उतनी तेज थी, जितनी एक नागरिक की जान बचाने के लिए होनी चाहिए?
अब कड़े कदम जरूरी
भारत सरकार को रूस जैसे मित्र राष्ट्रों के साथ इस मुद्दे को उच्चतम स्तर पर उठाना होगा। विदेश जाने वाले छात्रों और कामगारों के लिए एक अनिवार्य पंजीकरण और तत्काल 'रेस्क्यू प्रोटोकॉल' तैयार करने की आवश्यकता है। अगर आज हम खामोश रहे, तो शिक्षा और रोजगार के नाम पर हमारे देश के होनहार युवा इसी तरह 'डेथ जोन' में भेजे जाते रहेंगे।
राकेश और अजय का जाना केवल दो परिवारों की क्षति नहीं है, बल्कि यह देश के सुरक्षा तंत्र और कूटनीतिक प्रभाव के लिए एक बड़ी चुनौती है।