बिहार की सियासत ने आज एक ऐसा पन्ना पलटा है जिसे दशकों तक याद रखा जाएगा। पटना के लोक भवन में आयोजित एक गरिमामय समारोह के बीच सम्राट चौधरी ने बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली। यह क्षण भारतीय जनता पार्टी के लिए गौरवशाली है, क्योंकि राज्य के इतिहास में यह पहला अवसर है जब भाजपा का कोई कद्दावर चेहरा सीधे तौर पर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुआ है। नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद जिस तरह से सम्राट चौधरी के नाम पर सर्वसम्मति बनी, उसने साफ कर दिया कि प्रदेश में अब एक नई और ऊर्जावान राजनीति का उदय हो चुका है।

​सत्ता का नया समीकरण

​इस सियासी उलटफेर में केवल मुख्यमंत्री ही नहीं बदले, बल्कि सत्ता के संतुलन को साधने के लिए जदयू कोटे से दो अनुभवी चेहरों को उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई है। विजय चौधरी और विजेंद्र यादव ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर सरकार में अनुभव और सामंजस्य का नया मिश्रण पेश किया है। मंगलवार को नीतीश कुमार के पद छोड़ने के बाद जिस तेजी से घटनाक्रम बदला और भाजपा विधायक दल ने सम्राट चौधरी को अपना नेता चुना, वह पार्टी की भविष्य की रणनीति को स्पष्ट करता है। पटना की सड़कों पर लगे पोस्टर और समर्थकों का उत्साह यह बताने के लिए काफी है कि जनता इस बदलाव को सुशासन की नई उम्मीद के रूप में देख रही है।

​नीतीश का नया सफर

​बिहार की राजनीति में लंबे समय तक धुरी बने रहे नीतीश कुमार अब एक नई भूमिका में नजर आएंगे। मुख्यमंत्री पद का त्याग कर उन्होंने राज्यसभा का रास्ता चुना है, जो उनके राजनीतिक जीवन का एक नया पड़ाव है। नीतीश कुमार ने राज्यसभा सदस्य बनकर वह दुर्लभ कीर्तिमान स्थापित किया है जो बहुत कम राजनेताओं के नाम दर्ज है। वे अब बिहार के उन चुनिंदा दिग्गजों में शामिल हो गए हैं जिन्होंने विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा, यानी चारों सदनों की सदस्यता प्राप्त की है। हालांकि उन्होंने सक्रिय मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया है, लेकिन उनका मार्गदर्शन नई सरकार के लिए एक मजबूत आधार स्तंभ का काम करेगा।

​अनुभव और दलीय यात्रा

​रोचक तथ्य यह है कि नई सरकार के शीर्ष नेतृत्व में शामिल तीनों प्रमुख चेहरों—सम्राट चौधरी, विजय चौधरी और विजेंद्र यादव—का राजनीतिक सफर विभिन्न विचारधाराओं और दलों से होकर गुजरा है। सम्राट चौधरी ने जहां राजद और हम जैसी पार्टियों में तपकर भाजपा में अपनी जगह बनाई, वहीं विजय चौधरी ने कांग्रेस से निकलकर नीतीश कुमार के भरोसेमंद साथी के रूप में पहचान बनाई। विजेंद्र यादव भी 1990 के दौर से लेकर अब तक कई राजनीतिक उतार-चढ़ावों के गवाह रहे हैं। इन नेताओं का यह मिला-जुला अनुभव और जमीनी पकड़ बिहार के विकास के पहिये को नई गति देने की क्षमता रखता है।


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