मध्य पूर्व में जारी भीषण सैन्य संघर्ष के बीच बीजिंग से उभरी कूटनीतिक हलचल ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। चीन और पाकिस्तान ने मिलकर एक पांच-सूत्रीय शांति योजना पेश की है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य युद्ध की आग को और फैलने से रोकना है। इस प्रस्ताव के केंद्र में बिना किसी पूर्व शर्त के तत्काल युद्धविराम की मांग रखी गई है। बीजिंग में हुई गहन चर्चा के बाद तैयार इस मसौदे में होरमुज जलडमरूमध्य में जहाजों की निर्बाध आवाजाही और सैन्य दबाव के बिना कूटनीतिक संवाद बहाली पर जोर दिया गया है। यह पहल ऐसे समय में आई है जब खाड़ी के कई देश अनचाहे तरीके से इस युद्ध की लपेट में आ रहे हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल गहरा रहे हैं।

ईरान की कड़ी शर्तें

​तेहरान ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह केवल उसी स्थिति में पीछे हटेगा जब उसकी सुरक्षा और संप्रभुता की ठोस गारंटी दी जाएगी। ईरान की प्रमुख मांग है कि इजरायल द्वारा की जा रही लक्षित हत्याएं और हवाई हमले तत्काल और पूरी तरह बंद हों। इसके साथ ही वह युद्ध से हुई क्षति के लिए मुआवजे और भविष्य में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा गारंटी की मांग पर अड़ा है। सबसे संवेदनशील मुद्दा होरमुज स्ट्रेट पर नियंत्रण का है। ईरान चाहता है कि इस रणनीतिक जलमार्ग पर उसके प्रभुत्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिले, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए जीवन रेखा माना जाता है। जब तक इन बुनियादी चिंताओं को संबोधित नहीं किया जाता, तेहरान की ओर से किसी भी समझौते पर सहमति बनना मुश्किल नजर आ रहा है।

अमेरिकी रुख और गतिरोध

​वाशिंगटन का रुख बीजिंग के प्रस्ताव और तेहरान की मांगों से बिल्कुल विपरीत है। अमेरिका ने पंद्रह बिंदुओं वाला एक बेहद सख्त एजेंडा सामने रखा है, जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करने की शर्त प्रमुख है। व्हाइट हाउस चाहता है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन को शून्य पर लाए और अपने मौजूदा परमाणु स्टॉक को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में सौंप दे। इसके अलावा ईरान के मिसाइल विकास और क्षेत्रीय विद्रोही समूहों को मिल रहे समर्थन को खत्म करना अमेरिका की अनिवार्य शर्त है। हालांकि अमेरिका ने इसके बदले प्रतिबंधों में ढील देने का प्रलोभन दिया है, लेकिन ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानकर सिरे से खारिज कर चुका है।

ट्रंप का बड़ा ऐलान

​इस पूरे घटनाक्रम के बीच अब सबकी निगाहें 2 अप्रैल की सुबह होने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संबोधन पर हैं। युद्ध के पांचवें सप्ताह में प्रवेश करने के साथ ही यह सवाल बड़ा होता जा रहा है कि क्या अमेरिका सैन्य हस्तक्षेप बढ़ाएगा या किसी समझौते के लिए दबाव डालेगा। ट्रंप का यह भाषण तय करेगा कि चीन और पाकिस्तान द्वारा पेश किया गया साझा मंच केवल एक औपचारिक प्रस्ताव बनकर रह जाएगा या फिर यह वास्तव में किसी ठोस समझौते की नींव बनेगा। वर्तमान परिस्थितियों में भरोसे की कमी सबसे बड़ी खाई है। यदि महाशक्तियां और क्षेत्रीय खिलाड़ी अपने अड़ियल रुख में लचीलापन नहीं लाते, तो यह शांति प्रस्ताव महज कागजी साबित हो सकता है।


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