• लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की उखड़ती सांसें

​भारतीय मीडिया के इतिहास में साल 2025 को एक 'खूनी अध्याय' के रूप में याद किया जाएगा। फ्री स्पीच कलेक्टिव (FSC) की ताज़ा रिपोर्ट ने उन दावों की पोल खोल दी है जिनमें प्रेस की आज़ादी सुरक्षित होने की बात कही जाती थी। जाते-जाते यह साल पीछे नौ पत्रकारों की लाशें और तैंतीस घायल पत्रकारों का लहू छोड़ गया है। रिपोर्ट के डराने वाले आंकड़े बताते हैं कि पूरे साल देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लगभग पंद्रह हजार उल्लंघन दर्ज किए गए। यह महज़ आंकड़े नहीं बल्कि उस खौफनाक हकीकत का आइना हैं जहाँ सच की आवाज़ को लाठी, गोली और कानूनी शिकंजे के दम पर दबाने की हर मुमकिन कोशिश की गई।

सरकार का सहयोग पोर्टल और डिजिटल तालाबंदी

​इस साल पत्रकारों के लिए सड़कों से ज्यादा खतरनाक डिजिटल गलियारे साबित हुए। गृह मंत्रालय के 'सहयोग पोर्टल' ने अभिव्यक्ति की आज़ादी पर डिजिटल ताला लगाने का काम किया। आईटी एक्ट के नाम पर आलोचनात्मक आवाजों को 'अवैध कंटेंट' करार देकर हज़ारों सोशल मीडिया अकाउंट्स को मौत के घाट उतार दिया गया। एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स पर द वायर, कश्मीर टाइम्स और मकतूब मीडिया जैसे संस्थानों के संपादकों के खाते ब्लॉक किए गए। पहलगाम आतंकी हमले के बाद जब मीडिया ने प्रशासनिक चूक पर सवाल उठाए तो सरकार ने तकनीकी हथियारों का इस्तेमाल कर उन आवाजों को जनता तक पहुँचने से पहले ही रोक दिया। यह सेंसरशिप का वह आधुनिक चेहरा है जो बिना शोर किए कलम की ताकत छीन लेता है।

बस्तर से उत्तराखंड तक बिछी पत्रकारों की लाशें

​साल 2025 में पत्रकारों की हत्या के मामलों ने पूरे देश को झकझोर दिया। छत्तीसगढ़ के बस्तर में मुकेश चंद्राकर की संदिग्ध मौत हो या उत्तराखंड में यूट्यूब न्यूज़ क्रिएटर राजीव प्रताप का अंत, हर मामला व्यवस्था की विफलता की ओर इशारा करता है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और ओडिशा जैसे राज्यों में भी पत्रकारों को उनके पेशेवर काम की सजा मौत के रूप में दी गई। रिपोर्ट के अनुसार तैंतीस पत्रकारों पर हुए शारीरिक हमले और दर्जनों धमकियां यह साबित करने के लिए काफी हैं कि ज़मीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करना अब किसी युद्ध के मैदान में जाने जैसा है। माफिया और भ्रष्ट अधिकारियों के गठजोड़ ने मिलकर उन लोगों को निशाना बनाया जो उनके काले कारनामों की फाइलें खोल रहे थे।

राजद्रोह का डंडा और संस्थानों की कमर तोड़ने की साज़िश

​हिंसा के अलावा इस साल कानूनी आतंकवाद का भी जमकर प्रदर्शन हुआ। नेहा सिंह राठौर, अभिसार शर्मा, सिद्धार्थ वरदराजन और करण थापर जैसे दिग्गजों पर राजद्रोह के मुकदमे दर्ज कर उन्हें अपराधी साबित करने की कोशिश की गई। स्वतंत्र मीडिया संस्थानों को आर्थिक रूप से खत्म करने के लिए द रिपोर्टर्स कलेक्टिव का टैक्स स्टेटस रद्द कर दिया गया तो कश्मीर टाइम्स के दफ्तरों पर छापेमारी की गई। महाराष्ट्र में तो विधानसभा समितियों ने पत्रकारों को जेल तक भेजने की सिफारिशें कर डालीं। जाते-जाते 2025 ने भारतीय प्रेस स्वतंत्रता की रैंकिंग को उस रसातल में धकेल दिया है जहाँ से वापसी की राह फिलहाल धुंधली नज़र आ रही है।


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