इज़राइल में हुए आम चुनावों के बाद सरकार बनाने की रस्साकशी अब खुले टकराव में बदल चुकी है। मतदान केंद्रों पर जनता की भारी भागीदारी के बावजूद जब मतपेटियों से किसी भी दल को पूर्ण बहुमत मिलता नहीं दिखा, तो सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। माहौल में बारूद तब और भर गया जब प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने आधिकारिक तौर पर चुनावी प्रक्रिया पर ही सीधा हमला बोल दिया। लिकुड ने सार्वजनिक रूप से कड़ा बयान जारी करते हुए कहा कि इज़राइल राज्य में चुनाव उन अरब पार्टियों द्वारा चुरा लिए गए हैं जो रिश्वत, धमकियों, हिंसा, फर्जीवाड़े और मतदाताओं को जुटाने के लिए प्रतिबंधित सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल जैसे गंभीर आपराधिक कृत्यों के जरिए आतंकवाद और यहूदी राज्य के विनाश का समर्थन करती हैं। पार्टी का यह बयान साफ करता है कि 120 सीटों वाली कनेसेट में सरकार बनाने की यह लड़ाई अब सिर्फ राजनीतिक मतभेदों तक सीमित नहीं रही, बल्कि चुनावी तंत्र की वैधता पर सवालिया निशान बन गई है।
लिकुड पार्टी ने अपने आरोपों को सिर्फ जबानी दावों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे सीधे सुरक्षा और कानूनी एजेंसियों के पाले में डाल दिया है। पार्टी ने खुलकर कहा है कि वह पुलिस, आंतरिक सुरक्षा एजेंसी 'शिन बेत' और केंद्रीय चुनाव समिति को कई अरब मतदान केंद्रों पर चुनाव चोरी से जुड़े सैकड़ों सबूत और गवाहियां सौंप रही है। इनमें नकदी और रा'अम पार्टी की पर्चियों से भरे हजारों लिफाफे, मतदान केंद्र के कर्मियों को धमकियां व उनके साथ हिंसा, पर्दे के पीछे कई बार मतदान करना, दोहरी पहचान के साथ वोट डालना, लिफाफों और मतदाताओं की संख्या में भारी अंतर तथा मतदाताओं को लाने के लिए प्रतिबंधित सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल शामिल है। लिकुड ने पुलिस और शिन बेत से अरब पार्टियों द्वारा की गई इस चुनावी चोरी की गहन जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। साथ ही केंद्रीय चुनाव समिति से तत्काल संज्ञान लेने की मांग करते हुए इसे इज़राइली लोकतंत्र और नागरिकों के मताधिकार पर सीधा प्रहार बताया है, जिस पर कानून प्रवर्तन एजेंसियों को पूरी सख्ती से कदम उठाने को कहा गया है।
इन विस्फोटक आरोपों ने इज़राइली समाज और आम जनजीवन में गहरा तनाव पैदा कर दिया है। लगातार चुनावी दौरों से थकी हुई जनता के लिए यह नया गतिरोध भारी निराशा लेकर आया है। जब देश की सबसे बड़ी पार्टी ही चुनाव आयोग और चुनावी नतीजों की निष्पक्षता को कटघरे में खड़ा कर दे, तो आम नागरिक का भरोसा पूरी व्यवस्था से डगमगाने लगता है। इस टकराव का सीधा असर देश की रोजमर्रा की प्रशासनिक व्यवस्था, सुरक्षा नीतियों और आर्थिक फैसलों पर पड़ रहा है। इज़राइल का सामाजिक ताना-बाना आज यहूदी आबादी और अल्पसंख्यक अरब समुदाय के बीच पहले से कहीं अधिक बंटा हुआ नजर आ रहा है। चुनावी मैदान में लगे इन आरोपों ने संसद में किसी भी तरह के समझौते या सहमति के रास्ते को पूरी तरह बंद कर दिया है, जिससे 61 सीटों के जादुई आंकड़े तक पहुंचना किसी भी गुट के लिए असंभव पहेली बन गया है।
राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो विरोधी खेमा भी अपनी आपसी खींचतान में फंसा हुआ है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ़्ताली बेनेट और एविगडोर लिबरमैन जैसे कद्दावर नेता जहां एक तरफ अरब दलों के साथ किसी भी मंच को साझा करने से इनकार कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने नेतन्याहू के साथ जाने पर भी सख्त शर्तें लगा रखी हैं। दूसरी ओर, अति-धार्मिक यहूदी दल नेतन्याहू के पाले में मजबूती से खड़े हैं। इस त्रिकोणीय गतिरोध का असर सिर्फ इज़राइल तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया की महाशक्तियों पर भी पड़ रहा है। अमेरिका में नवंबर के शुरुआती हफ्तों में होने वाले महत्वपूर्ण चुनावों के समय मध्य-पूर्व का यह सियासी भूचाल सीधे तौर पर वाशिंगटन की विदेश नीति और क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर रहा है। दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी खंडित जनादेश के उदाहरण मिलते हैं, लेकिन इज़राइल का भौगोलिक और सामरिक ढांचा इतना संवेदनशील है कि यहां सत्ता का लंबा गतिरोध पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है।
इज़राइल के चुनावी और संवैधानिक नियमों की जमीनी हकीकत यही है कि जब तक कोई नया गठबंधन संसद में पूर्ण बहुमत साबित नहीं कर देता, तब तक देश की बागडोर कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में बेंजामिन नेतन्याहू के हाथों में ही सुरक्षित रहेगी। विरोधी दलों के अंतर्विरोध यदि उन्हें किसी एक साझा नेता पर सहमत नहीं होने देते और देश को दोबारा चुनाव की दहलीज पर धकेल दिया जाता है, तब भी सत्ता की वास्तविक कमान नेतन्याहू के पास ही बनी रहेगी। इस गहरे दलदल से बाहर निकलने का एकमात्र व्यावहारिक रास्ता यही है कि चुनाव आयोग और स्वतंत्र न्यायिक एजेंसियां लगाए गए सभी गंभीर आरोपों की बिना किसी पक्षपात के तेजी से जांच पूरी करें। चुनावी संस्थाओं की साख को बचाते हुए और बेबुनियाद संदेहों को दूर करके ही देश में एक स्थिर और जिम्मेदार सरकार की जमीन तैयार की जा सकती है, जिससे लोकतंत्र पर मंडरा रहा यह संकट शांत हो सके।
ताजा अपडेट : इजराइल इलेक्शन
नेतन्याहू ब्लॉक - 54 सीट्स
ऑपोजिशन ब्लॉक -49 सीट्स
अरब पार्टी - 17 सीट्स।
अब एक दो सीट्स का ही अंतर रह सकता है मुख्यत: दोनों मुख्य ब्लॉक के बीच।
आगे क्या?
नेतन्याहू की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। तो संविधान के मुताबिक नेतन्याहू को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। इसके लिए 28 दिन का मौका होगा। जोड़ तोड़कर सरकार बना लें। वरना विपक्षी पार्टी को सरकार बनाने का मौका मिलेगा।
जैसा कि चुनाव के दौरान दोनों मुख्य पार्टियों ने अरब ब्लॉक से समर्थन न लेने का वादा की हैं। इसलिए संभावना कम है कि इनका सहयोग कोई ले।
अब दूसरी संभावना है विपक्षी पार्टी के गठबंधन को तोड़ना। इससे नेतन्याहू 61 सीट्स पार कर सरकार बना सकते हैं।
इन सबके बीच इस बात का ध्यान रखना है कि दोनों मुख्य पार्टी के विचारधारा में तनिक भी अंतर नहीं है। दोनों को नरसंहार में भरोसा है।
नेतन्याहू के फिर से प्रधानमंत्री बनने पर इजराइल और अलग थलग पड़ सकता है।
---समाप्त---