राजधानी की सड़कों पर विपक्षी सांसदों के मार्च के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का एक बेहद कड़ा रुख देखने को मिला। सुरक्षा घेरे और बंद गेट की सलाखों के पीछे खड़े होकर जब उन्होंने खुले तौर पर कहा कि इनमें से कोई बच नहीं पाएगा और जो हुआ है वह देशद्रोह है, तो इस बयान ने सीधे तौर पर पूरे मामले को कानूनी और संवैधानिक तराजू पर ला खड़ा किया। आम तौर पर चुनावी राजनीति में तीखी नोकझोंक देखने को मिलती है, लेकिन जब प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख और मुख्य चुनाव आयुक्त का नाम एक साथ लेकर ऐसी बात कही जाए, तो यह केवल चुनावी खींचतान नहीं रह जाती। यह मामला सीधे तौर पर यह समझने का बन जाता है कि लोकतंत्र में विरोध की सीमा क्या है और कानून की नजर में इन बातों की असलियत क्या है।

​सबसे पहला सवाल कानून के जानकारों के सामने यही आता है कि क्या चुनावी हेराफेरी या वोट से जुड़ी कथित गड़बड़ियां वाकई देशद्रोह के दायरे में आती हैं। देश के कानूनी प्रावधानों में संप्रभुता को चोट पहुंचाने या देश के खिलाफ जाने वाले अपराधों की परिभाषा बहुत सख्त और तयशुदा है। कानून की किताब में इसके तहत हथियारबंद बगावत या देश को हिंसक तरीके से नुकसान पहुंचाने जैसी बातें आती हैं। चुनावों से जुड़े मसलों के लिए अलग कानून बना हुआ है, जिसमें धांधली या गड़बड़ी को चुनावी कदाचार और आपराधिक साजिश माना जाता है। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष का इस मामले में देशद्रोह शब्द का प्रयोग करना कानून की धारा से ज्यादा जनता की भावनाओं को छूने की एक कोशिश नजर आती है, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि वोट के अधिकार पर चोट सीधे देश की आत्मा पर वार है।

​अब बात आती है कि क्या इतने बड़े पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ सीधे ऐसी कार्रवाई संभव है। हमारे संविधान में कानून का राज सबसे ऊपर है और कोई भी व्यक्ति कानून से बड़ा नहीं माना गया है। यदि कभी जांच में किसी भी पद पर बैठे व्यक्ति की भूमिका गलत साबित होती है, तो अदालत के रास्ते कार्रवाई के रास्ते खुले रहते हैं। संविधान केवल राष्ट्रपति और राज्यपालों को पद पर रहते हुए कानूनी मामलों में अस्थाई छूट देता है, प्रधानमंत्री या मंत्रियों को नहीं। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद में महाभियोग जैसी भारी-भरकम प्रक्रिया तय है। असल जिंदगी में बिना किसी ठोस और पुख्ता सबूत के अदालत में ऐसे मामलों को कानूनी रूप से साबित करना बेहद पेचीदा और मुश्किल काम होता है।

​इस पूरे घटनाक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत का नाम शामिल करना भी विपक्ष की एक खास रणनीति दिखाता है। संघ प्रमुख न तो सरकार के किसी पद पर हैं और न ही चुनावी व्यवस्था के काम में सीधे तौर पर शामिल हैं। इसके बावजूद उनका नाम लेना यह बताता है कि विपक्ष इस लड़ाई को केवल सरकार से नहीं, बल्कि उस पूरी वैचारिक सोच से जोड़कर जनता के सामने रखना चाहता है। यह दिखाने का प्रयास है कि सत्ता और संस्थाओं के पीछे कोई दूसरा रिमोट कंट्रोल काम कर रहा है। दुनिया के तमाम बड़े लोकतांत्रिक देशों में भी जब कभी संस्थाओं की भूमिका पर सवाल उठते हैं, तो आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला ऐसे ही वैचारिक टकराव की शक्ल ले लेता है।


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​आखिर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आम जनता इन बातों को किस नजरिए से देखती है। देश का मतदाता अब बहुत सजग और व्यावहारिक हो चुका है। केवल माइक पर या सड़क पर खड़े होकर तीखी भाषा में आरोप लगाने भर से लोग अपनी राय नहीं बदलते। जब तक किसी आरोप के पीछे ठोस आंकड़े, पुख्ता सबूत और जमीनी सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक आम लोग इसे केवल चुनावी हार-जीत की हताशा या रोजमर्रा की राजनीति मानकर आगे बढ़ जाते हैं। सत्ता पक्ष भी ऐसे मौकों पर पलटवार करते हुए इसे संस्थाओं को कमजोर करने की चाल बताकर विपक्ष को घेरने में जुट जाता है।

​लोकतंत्र की गाड़ी तभी सही पटरी पर चल सकती है जब संस्थाओं की निष्पक्षता भी बनी रहे और उन पर भरोसा भी बना रहे। विपक्ष का काम सवाल उठाना जरूर है, लेकिन उन सवालों के पीछे जिम्मेदारी और पक्के सुबूत होने चाहिए ताकि संस्थाओं की साख पूरी तरह मिट्टी में न मिले। वहीं, चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को भी चाहिए कि जब कोई बड़ा सवाल खड़ा हो, तो आगे आकर पूरी पारदर्शिता के साथ जनता और राजनीतिक दलों के संशय दूर करें। सड़क की नारेबाजी से आगे बढ़कर अगर बात ठोस सबूतों और पारदर्शी व्यवस्था पर होगी, तभी देश के लोकतांत्रिक ढांचे की गरिमा सुरक्षित रह पाएगी।

---समाप्त---