किसी भी लोकतांत्रिक देश की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि आम आदमी को चुनावी व्यवस्था पर आंख मूंदकर यकीन हो। मतदाता जब वोट डालने निकलता है, तो उसे यह पक्का भरोसा होना चाहिए कि उसका नाम वोटर लिस्ट में सुरक्षित है और चुनाव कराने वाला तंत्र किसी के दबाव में नहीं झुकेगा। हमारे देश में चुनाव आयोग की पहचान हमेशा एक निष्पक्ष और मजबूत पहरेदार के तौर पर रही है। इसी वजह से जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज के तरीके और आयोग के अंदर लिए जा रहे फैसलों पर उंगलियां उठने लगी हैं, तो यह बात केवल अफसरों के बीच की कहासुनी तक सीमित नहीं रह जाती। वोटर लिस्ट के नए नियमों, फॉर्म में बदलाव और कंप्यूटर डेटा के कामकाज को लेकर बाकी दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की बात बाहर आने के बाद यह बहस बहुत बड़ी हो चुकी है।
इस पूरे झगड़े की असली वजह वे फैसले हैं, जिनका सीधा ताल्लुक आम नागरिक के वोट देने के हक से है। वोटर लिस्ट किसी भी चुनाव की रीढ़ होती है। अगर इसमें नाम जोड़ने या हटाने के नियमों को अचानक पेचीदा बना दिया जाए, पुराने कागजात मांगे जाएं या फिर जिलों में बैठे अफसरों के अधिकार छीनकर सब कुछ ऊपर से तय होने लगे, तो लोगों के मन में डर पैदा होना लाजिमी है। किसी भी आम आदमी के लिए वोटर लिस्ट से नाम कट जाना कोई छोटी बात नहीं होती। इसका सीधा मतलब यह है कि देश के सबसे बड़े फैसले में उसकी आवाज छीन ली गई। जब आयोग के ही बड़े अफसर यह कहने लगें कि जमीनी हकीकत को समझे बिना और आपस में पूरी बात किए बिना नए नियम लागू किए जा रहे हैं, तो आम जनता की चिंता और ज्यादा बढ़ जाती है।
सियासी गलियारों में इस मुद्दे पर जोरदार हंगामा शुरू हो गया है। विपक्षी पार्टियां इसे चुनावी व्यवस्था में गड़बड़ी की आशंका बताकर मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफे की मांग कर रही हैं और मामले को अदालत तक ले जाने की तैयारी में हैं। दूसरी तरफ, आयोग और सरकार से जुड़े जानकारों का कहना है कि चुनाव आयोग में कई सदस्य होते हैं, जहां फाइलों पर चर्चा होना, किसी बात पर असहमति जताना और अपनी राय लिखना बिल्कुल आम बात है। उनका कहना है कि सभी आखिरी फैसले नियमों के तहत ही लिए गए हैं। राजनेता अपनी-अपनी राजनीति के हिसाब से बयानबाजी करते रहेंगे, लेकिन असली चिंता यह है कि देश की सबसे भरोसेमंद संस्था को लेकर बार-बार सवाल क्यों खड़े हो रहे हैं और उसे अपनी सफाई देने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
अगर हम दुनिया के बाकी बड़े लोकतांत्रिक मुल्कों को देखें, तो वहां चुनाव कराने वाली संस्थाओं की ताकत उनके फैसलों के खुलेपन में होती है। अमेरिका, ब्रिटेन या दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में वोटर लिस्ट तैयार करने या वोटिंग के नियमों में कोई भी फेरबदल करने से पहले राजनीतिक दलों और आम जनता के साथ बैठकर खुली बातचीत की जाती है। दक्षिण अफ्रीका का चुनाव आयोग दुनिया भर में मिसाल माना जाता है, क्योंकि वहां कंप्यूटर सिस्टम और पूरी प्रक्रिया की जांच समय-समय पर बाहर के जानकारों से कराई जाती है ताकि कोई उंगली न उठा सके। जब फैसले बंद कमरों के बजाय सबके सामने खुले तौर पर लिए जाते हैं, तो किसी भी पार्टी के लिए बेबुनियाद आरोप लगाना नामुमकिन हो जाता है।
हमारे संविधान ने चुनाव आयोग को किसी एक अफसर की मर्जी से चलाने के लिए नहीं बनाया था। सुप्रीम कोर्ट भी बहुत पहले साफ कह चुका है कि आयोग के तीनों सदस्यों का कद, रुतबा और ताकत बराबर है। मुख्य चुनाव आयुक्त टीम के मुखिया जरूर हैं, लेकिन वे अकेले मालिक नहीं हो सकते। आज सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि आयोग के अंदर मिलकर फैसले लेने की पुरानी परंपरा को फिर से बहाल किया जाए। वोटर लिस्ट से जुड़े नए नियमों और सिस्टम को लेकर एक खुली रिपोर्ट जनता के सामने रखी जानी चाहिए, ताकि किसी भी वोटर या राजनीतिक दल के मन में रत्ती भर भी शक न रहे। चुनाव आयोग की असली ताकत किसी कानून की धारा में नहीं, बल्कि आम आदमी के भरोसे में है, और इस भरोसे को हर हाल में बचाए रखना होगा।
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