कहते हैं कि बिना आग के धुआं नहीं उठता। देश की सबसे प्रतिष्ठित लोकतांत्रिक संस्था यानी भारत निर्वाचन आयोग के भीतर से उठ रही सुगबुगाहट भी इसी बात की गवाही दे रही है। जब किसी संस्था के बंद कमरों से मतभेद बाहर आने लगें, तो समझना चाहिए कि बात सिर्फ अफवाहों तक सीमित नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनके सहयोगी आयुक्तों के बीच फैसलों को लेकर सामने आई लिखित आपत्तियों ने इसी धुएं को हवा दी है। केरल कैडर के पूर्व प्रशासनिक अधिकारी ज्ञानेश कुमार ने जब फरवरी 2025 में कार्यभार संभाला था, तब उनसे एक सुचारू और पारदर्शी व्यवस्था की उम्मीद थी। इसके उलट, मीडिया में आई यह जानकारी हैरान करती है कि आयोग के भीतर ही बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई फैसलों पर लिखित असहमति जताई है। जब एक ही छत के नीचे बैठे शीर्ष नीति-निर्माताओं के बीच आपसी संवाद के बजाय औपचारिक आपत्तियों का सहारा लिया जाने लगे, तो साफ है कि व्यवस्था के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है।

​इस पूरे विवाद की जड़ में मतदाता सूची का संशोधन, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन और चुनावी आंकड़ों के प्रबंधन से जुड़े अहम प्रशासनिक कदम बताए जा रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 324 की मूल भावना यही है कि चुनाव आयोग एक साझा मंच की तरह काम करे, जहां बहुमत या सर्वसम्मति से महत्वपूर्ण फैसले लिए जाएं। जब यह बात सामने आती है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने साथी आयुक्तों की राय या आपत्तियों को दरकिनार कर अपनी राह चुनी, तो यह सीधे तौर पर संस्था की आंतरिक कार्यशैली पर उंगली उठाती है। विपक्षी दलों का आरोप है कि नियमों और आंकड़ों के प्रबंधन में पारदर्शिता को किनारे रखा गया है। इसी नाराजगी की वजह से विपक्षी खेमा अब संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए महाभियोग का दांव चलने की तैयारी कर रहा है। सरकार और उनके समर्थकों का भले ही यह कहना हो कि सभी नियुक्तियां और प्रशासनिक प्रक्रियाएं नियमों के तहत हुई हैं, लेकिन आयोग के भीतर मची खींचतान ने जनता के बीच संदेह की गुंजाइश तो पैदा कर ही दी है।

​एक आम मतदाता के नजरिए से देखें तो चुनाव आयोग केवल एक सरकारी दफ्तर नहीं, बल्कि उसके मतदान के अधिकार का सबसे बड़ा पहरेदार है। जब मतदाता सूची बनाने, उसमें नाम जोड़ने या काटने जैसी बुनियादी प्रक्रियाओं पर ही आयोग के भीतर मतभेद उभर आएं, तो इसका असर सीधे चुनावी नतीजों की साख पर पड़ता है। अगर आम नागरिक के मन में यह आशंका घर कर जाए कि चुनावी आंकड़े और नियम पूरी तरह निष्पक्ष नहीं हैं, तो इससे पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियाद हिल सकती है। किसी भी स्वतंत्र संस्था के लिए केवल निष्पक्ष रहना ही काफी नहीं होता, बल्कि उसका निष्पक्ष दिखना भी उतना ही जरूरी होता है। जब संस्था के अपने ही सदस्य फैसलों की प्रक्रिया से असहज हों, तो फिर बाहर के राजनीतिक दलों और आम जनता का भरोसा जीतना नामुमकिन सा हो जाता है।

​दुनिया के परिपक्व लोकतंत्रों पर नजर डालें तो वहां चुनावी संस्थाओं की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर बेहद सख्त और पारदर्शी नियम बने हुए हैं। ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में चुनाव कराने वाले बोर्ड के भीतर अगर किसी नीतिगत बात पर असहमति होती है, तो उसे दबाने के बजाय लिखित रिकॉर्ड और खुली चर्चा का हिस्सा बनाया जाता है, ताकि किसी पक्षपात का अंदेशा न रहे। दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में चुनाव आयोग के भीतर की बैठकों की प्रक्रिया इतनी स्पष्ट रखी जाती है कि राजनीतिक दलों को सवाल उठाने की जगह ही नहीं मिलती। हमारे देश में भी चुनाव आयोग ने अतीत में कई बड़े संकटों का सामना किया है और टीएन शेषन के दौर से लेकर कई कड़े सुधार देखे हैं, लेकिन उस समय आयोग की स्वायत्तता और आंतरिक मजबूती पर कभी ऐसे सवाल नहीं उठे थे। मौजूदा विवाद यह दिखाता है कि अगर फैसलों को बंद कमरों में सीमित रखा जाएगा, तो संदेह का दायरा बढ़ना बिल्कुल तय है।


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​साल 2029 तक के कार्यकाल के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती संस्था की खोई साख और भरोसे को फिर से बहाल करने की है। महाभियोग की सियासी हलचलों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से परे जाकर, चुनाव आयोग को खुद आगे आना होगा और अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली को पूरी तरह खुला बनाना होगा। साथी आयुक्तों के बीच नीतिगत मतभेदों को आपसी चर्चा और पूर्ण सहमति से दूर करना ही सबसे समझदारी भरा कदम है। जब तक वोटर लिस्ट और चुनावी प्रक्रिया के हर फैसले में पूरी ईमानदारी और स्पष्टता दिखाई नहीं देगी, तब तक यह अविश्वास शांत नहीं होगा। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि जनता का विश्वास कायम रहे, और इसके लिए चुनाव आयोग को यह साबित करना होगा कि वह किसी एक व्यक्ति की मर्जी से नहीं, बल्कि पूरे संविधान और सामूहिक जिम्मेदारी से चलने वाली संस्था है।

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