भारत के पेट्रोल पंपों पर इन दिनों एक खामोश तब्दीली आ चुकी है। यदि आप देश के किसी भी हिस्से में अपनी गाड़ी में ईंधन भरवा रहे हैं, तो आपके वाहन के इंजन में जाने वाला तेल वह पारंपरिक शुद्ध पेट्रोल नहीं है जिसे आप सालों से इस्तेमाल करते आ रहे हैं। सरकार की नई पेट्रोलियम नीति के तहत अब देशभर में अनिवार्य रूप से 'E20' यानी 20 फीसदी इथनॉल मिश्रित पेट्रोल बेचा जा रहा है।
अधिकारियों का दावा है कि यह कदम देश को हरित भविष्य की ओर ले जाएगा, लेकिन जमीन पर आम उपभोक्ताओं और विशेषज्ञों के बीच इसे लेकर बेचैनी और नाराजगी साफ देखी जा सकती है।
आर्थिक बोझ और गिरता माइलेज
इथनॉल नीति को लेकर आम जनता में सबसे बड़ा असंतोष आर्थिक मोर्चे पर है। एक टैक्सी चालक, रमेश कुमार का कहना है, “पहले गाड़ी जो माइलेज देती थी, अब उससे कम दे रही है। पेट्रोल की कीमतें कम नहीं हुईं, लेकिन हमारी गाड़ियों का खर्च बढ़ गया है।”
विशेषज्ञों के अनुसार, रमेश की यह शिकायत तकनीकी रूप से पूरी तरह सही है। इथनॉल की ऊर्जा क्षमता (Energy Density) शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले कम होती है। इसका सीधा गणित यह है कि पेट्रोल में इथनॉल की मात्रा जितनी बढ़ेगी, गाड़ी का माइलेज उतना ही घटेगा। अनुमानों के मुताबिक, E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से वाहनों के माइलेज में 5 से 7 फीसदी की गिरावट आई है। उपभोक्ता को एक तरफ पेट्रोल की पूरी कीमत चुकानी पड़ रही है, और दूसरी तरफ कम माइलेज के कारण उनकी जेब पर अतिरिक्त मार पड़ रही है।
पुरानी गाड़ियों के अस्तित्व पर संकट
इस नीति का दूसरा और सबसे संवेदनशील पहलू है भारत की सड़कों पर दौड़ने वाले करोड़ों पुराने वाहन। साल 2023 से पहले निर्मित अधिकांश गाड़ियाँ तकनीकी रूप से E20 ईंधन के अनुकूल नहीं हैं।
एक अन्य टैक्सी चालक, सुखमीत सिंह का कहना है, "उनकी कार 2021 मॉडल है। जो ई 20 पेट्रोल के लिए नहीं बनी है। इथनॉल मिक्स पेट्रोल की वजह से गाड़ियों के रखरखाव का खर्च बढ़ गया है। पहले जहां महीने में एक बार मैकेनिक के पास जाते थे। अब हर हफ्ते जाना पड़ता है। "
मिश्रण में मौजूद इथनॉल हवा से नमी (पानी) सोखता है। जब गाड़ी कुछ दिनों के लिए खड़ी रहती है, तो यह नमी ईंधन टैंक और पाइपलाइनों में जंग का कारण बनती है। रबर के पार्ट्स और फ्यूल इंजेक्टर्स इस केमिकल रिएक्शन के कारण समय से पहले दम तोड़ रहे हैं। ऑटोमोबाइल मैकेनिकों के पास इन दिनों ईंधन प्रणाली खराब होने के मामले तेजी से बढ़े हैं। संकट यह है कि सरकार ने उन लोगों के लिए कोई वैकल्पिक 'शुद्ध पेट्रोल' का विकल्प नहीं छोड़ा है, जो अपनी पुरानी गाड़ियों को संभाल कर रखना चाहते हैं।
चिंता की नई लहर: 25, 27 और 30 फीसदी ब्लेंडिंग की तैयारी
उपभोक्ताओं की परेशानियां यहीं खत्म होती नहीं दिख रही हैं। ऑटोमोबाइल सेक्टर और नीतिगत गलियारों से आ रही खबरें आम गाड़ी मालिकों की चिंता को और बढ़ाने वाली हैं। सरकार केवल E20 (20 फीसदी) पर रुकने का इरादा नहीं रखती; इसके आगे के रोडमैप पर काम शुरू हो चुका है।
पेट्रोलियम मंत्रालय और संबंधित तकनीकी संस्थान अब पेट्रोल में इथनॉल की मात्रा को क्रमशः 25 फीसदी, 27 फीसदी और अंततः 30 फीसदी (E30) तक ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए बकायदा विभिन्न इंजनों पर टेस्टिंग और व्यावहारिक अध्ययनों का दौर चल रहा है। ऑटोमोटिव विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मिश्रण 25 या 30 फीसदी तक पहुंचता है, तो आज की तारीख में सड़कों पर चल रही सामान्य 'E20 रेडी' गाड़ियाँ भी तकनीकी दिक्कतों का सामना कर सकती हैं। इससे माइलेज में और ज्यादा गिरावट आएगी और इंजनों के भीतर मेटल और रबर पार्ट्स के गलने (Corrosion) की रफ्तार दोगुनी हो सकती है, जो सीधे तौर पर आम आदमी की जेब पर एक और बड़ा प्रहार होगा।
सरकार का तर्क: मजबूरी या मास्टरस्ट्रोक?
सड़कों पर दिख रही इस नाराजगी और भविष्य की आशंकाओं के बावजूद नीति निर्माता अपने फैसले को देशहित में बता रहे हैं। सरकार के इस कदम के पीछे तीन मुख्य स्तंभ हैं:
- विदेशी मुद्रा की बचत: भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। ब्लेंडिंग को बढ़ाकर 25 से 30 फीसदी करने से सालाना अरबों डॉलर की अतिरिक्त विदेशी मुद्रा बचेगी।
- किसानों को लाभ: इथनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने और अधिशेष अनाज से होता है। सरकार का दावा है कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है और किसानों को सीधे भुगतान मिल रहा है।
- कार्बन उत्सर्जन में कमी: पर्यावरण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इथनॉल ब्लेंडिंग से वाहनों से होने वाले हानिकारक कार्बन मोनोऑक्साइड उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
क्या कहते हैं ऊर्जा विश्लेषक
इसमें कोई दो राय नहीं है कि कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना और पर्यावरण की रक्षा करना भारत जैसे विशाल देश के लिए बेहद जरूरी है। लेकिन बीबीसी से बातचीत में ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि इस बदलाव की गति इतनी तेज रही है कि आम नागरिक को इसके लिए तैयार होने का मौका ही नहीं मिला।
जब तक पुरानी गाड़ियों के लिए सुरक्षित ईंधन का कोई विकल्प या सुरक्षात्मक एडिटिव्स सस्ते में उपलब्ध नहीं कराए जाते, और आगामी 25-30 फीसदी ब्लेंडिंग से पहले उपभोक्ताओं को तकनीकी रूप से आश्वस्त नहीं किया जाता, तब तक पर्यावरण सुधार की इस सरकारी नीति को आम भारतीय अपनी जेब और अधिकारों पर एक एकतरफा बोझ के रूप में ही देखता रहेगा।
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