देश की युवा आबादी आज शिक्षा प्रणाली के गिरते स्तर, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता और भीषण बेरोजगारी के संकट से बुरी तरह जूझ रही है। जिस कारण वर्ष 1997 से 2019 के बीच जन्मी जेन-ज़ेड पीढ़ी आगामी 2029 के आम चुनाव में एक ऐसा अप्रत्याशित राजनीतिक तूफान बनने जा रही है, जो किसी भी स्थापित दल के चुनावी समीकरणों को पलटने की ताकत रखती है।
अनुमानों के मुताबिक 2029 तक भारत में लगभग 36 करोड़ युवा मतदान की उम्र में प्रवेश कर चुके होंगे। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे अहम राज्यों में ही लगभग 19.27 करोड़ संभावित युवा मतदाता होंगे। लोकनीति-सीएसडीएस के आंकड़े बताते हैं कि 2014 से 2019 के बीच भाजपा ने युवा वर्ग पर पकड़ बनाई थी, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं।
एक साधारण परिवार बच्चे की पढ़ाई और कोचिंग पर जीवन भर की गाढ़ी कमाई खर्च कर देता है। इसके बावजूद नीट जैसी परीक्षाओं में धांधली और जेपीएससी व जेएसएससी में पेपर लीक की खबरें आती हैं। ऐसे में युवा का मेहनत और भविष्य पर से भरोसा टूटने लगता है।
आज का युवा समझ चुका है कि महंगी कोचिंग, सीमित अवसर और संस्थागत भ्रष्टाचार अलग-अलग समस्याएँ नहीं हैं। ये एक ही जर्जर व्यवस्था का हिस्सा हैं जिसने उनके स्वाभिमान को चोट पहुँचाई है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण जंतर-मंतर के छात्र आंदोलनों और झारखंड में विधानसभा घेराव में देखने को मिला।
इन प्रदर्शनों ने इस गलतफहमी को ध्वस्त कर दिया कि जेन-ज़ेड को केवल सोशल मीडिया अभियानों, मीम्स या रील्स की भाषा से साधा जा सकता है। युवाओं ने किसी राजनीतिक दल के नेता को मंच पर नहीं चढ़ने दिया और न ही किसी पार्टी का झंडा लहराने दिया।
जेन-ज़ेड ने सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को कड़ा संदेश दिया है कि वे किसी दल का वोट बैंक नहीं, बल्कि व्यवस्था का रिपोर्ट कार्ड हैं। उन्हें खोखली विचारधारा से नहीं, बल्कि पारदर्शी नतीजों से मतलब है।
यहीं पर मुख्य विपक्षी दलों की भी सबसे बड़ी विफलता उजागर होती है। विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं है, लेकिन वह इस आक्रोश को एक स्थायी संगठन में ढालने में नाकाम रहा है। केवल आंदोलन के बाद फोटो खिंचवाना या संसद में बयानबाजी करना दूरगामी विकल्प नहीं है।
हालाँकि, जेन-ज़ेड की यह बेचैनी केवल राजनीति और चुनावी गणित तक सीमित नहीं है, यह एक गहरे सामाजिक बदलाव का भी संकेत है। जब पुरानी पीढ़ियाँ जेन-ज़ेड के फैसलों को देखती हैं, तो वे इसे अक्सर अधीरता, अधिकारबोध या जिम्मेदारियों से भागना कहती हैं।
लेकिन जेन-ज़ेड ने इस जीवनशैली को बहुत शांत मन से परखा है और इसे केवल एक खराब सौदा माना है। पुरानी पीढ़ियों को अलग तरह से तैयार किया गया था—माता-पिता से डरना, समाज की चिंता करना, बड़ों की बात मानना, नौकरी से वफादार रहना, चुपचाप सहते रहना और सवाल कम करना।
जेपी आंदोलन, आपातकाल विरोधी संघर्ष, अन्ना हजारे और निर्भया आंदोलन जैसे पुराने विरोध प्रदर्शनों में एक नैतिक आक्रोश, त्याग, गुस्सा और भय था। इसके विपरीत, जेन-ज़ेड अपने साथ गुस्सा तो लाई है, लेकिन उसने गंभीरता का बोझ उठाने से इनकार कर दिया है।
उसका विरोध तर्क, कटाक्ष, हास्य और व्यंग्य के साथ आता है, जहाँ राजनीति को साबित करने के लिए रोने-धोने का प्रदर्शन करना ज़रूरी नहीं लगता। संभव है कि भावनाओं और "लोग क्या कहेंगे" के डर ने पुरानी पीढ़ियों के विवेक को धुंधला किया हो, जहाँ लोगों ने सिर्फ किसी को निराश न करने के लिए समझौते किए।
जेन-ज़ेड ने इस पूरी विरासत को खारिज कर दिया है। वह यह नहीं मानती कि सार्थक जीवन जीने के लिए दशकों तक कष्ट सहना या किसी काल्पनिक बेहतर दिन का इंतजार करना जरूरी है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बदलते करियर और जलवायु संकट के इस दौर में, यह पीढ़ी अपनी इच्छाओं को टालना नहीं चाहती। उसका सीधा सवाल है कि जब तक जीवन है, तब तक खुलकर जी लिया जाए। पुरानी पीढ़ियों ने जीवन "लोग क्या कहेंगे" की चिंता में बिताया, जबकि जेन-ज़ेड केवल यह पूछती है—"मुझे इसकी परवाह क्यों करनी चाहिए?"
जेन-ज़ेड किसी भी राजनीतिक दल की बंधी-बंधाई संपत्ति नहीं है। यह जाति, धर्म, वर्ग और क्षेत्र से ऊपर उठकर अपने बेहतर, सुरक्षित और व्यावहारिक भविष्य के लिए एकजुट हो रही है।
समय के साथ बदलना अगर हमारी परंपरा का हिस्सा है, तो पुरानी पीढ़ियों और राजनेताओं को भी अपनी सोच बदलनी होगी। 2029 का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत का पारंपरिक ढांचा इस 36 करोड़ की युवा लहर की मंशा को समझेगा, या फिर यह पीढ़ी पुरानी राजनीति और सामाजिक नियमों को दरकिनार कर अपना रास्ता खुद तय करेगी।
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