देश के करोड़ों वाहन चालकों की खामोशी अब एक विशाल जन-आंदोलन में बदलना शुरू हो चुकी है, जिस कारण सरकार के नीति निर्माताओं के लिए असहज स्थिति पैदा होना लाजमी है। एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के नाम पर गाड़ियों के इंजनों के बर्बाद होने की शिकायतों के बीच इंटरनेट पर 'E20 जनता पार्टी' का एक ऐसा बवंडर उठना शुरू हो चुका है जो जल्द थमने का नाम नहीं लेने वाला। एक्स से लेकर फेसबुक और इंस्टाग्राम तक, हर जगह इस नए अभियान के अकाउंट्स बनते ही वायरल हो रहे हैं और लाखों की संख्या में असंतुष्ट नागरिक इससे जुड़कर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं।
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी सीधे जनता के निशाने पर हैं। अब तक सरकारी मंचों से E20 को बिल्कुल सुरक्षित बताने और माइलेज में मामूली फर्क का दावा करने वाली दलीलों ने लोगों के जले पर नमक छिड़कने का काम किया है। लोग अपनी मेहनत की कमाई से खरीदी गई गाड़ियों के गलते पार्ट्स और कबाड़ बनते इंजनों के वीडियो पोस्ट करके पूछ रहे हैं कि इस आर्थिक तबाही का जिम्मेदार कौन है? इसी गुस्से के बीच डिजिटल स्पेस में नितिन गडकरी के इस्तीफे की मांग जोर पकड़ चुकी है।
सरकार का दावा: सुरक्षित है E20 ईंधन
दूसरी तरफ, उठते विवादों के बीच सरकार, तेल विपणन कंपनियों और वाहन निर्माताओं ने अपने पक्ष को मजबूती से सामने रखा है। ऑटोमोबाइल रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया और कार निर्माता कंपनियों का दावा है कि E20 ईंधन से आधुनिक इंजनों को कोई दीर्घकालिक क्षति नहीं पहुंचती। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और पेट्रोलियम मंत्रालय की दलील है कि भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और कच्चे तेल के आयात पर विदेशी मुद्रा की निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल ब्लेंडिंग मास्टरस्ट्रोक है।
तेल कंपनियों का कहना है कि E20 पेट्रोल से जहरीले कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आती है, जो पर्यावरण संरक्षण के लिए बेहद जरूरी है। इसके साथ ही सरकार का यह भी तर्क है कि एथेनॉल की खरीद से देश के गन्ना किसानों को हजारों करोड़ रुपये का सीधा फायदा पहुंच रहा है। कंपनियों के मुताबिक, प्रयोगशाला परीक्षणों में केवल तीन से छह प्रतिशत तक माइलेज का अंतर देखा गया है, जबकि चालकों द्वारा इंजनों में जंग लगने की शिकायतों को पुरानी गाड़ियों के मेंटेनेंस और हवा में मौजूद नमी से जोड़कर देखा जा रहा है।
E20 के रेट में शुद्ध पेट्रोल देने की अंतिम चेतावनी
हालांकि, कंपनियों और सरकार की इन दलीलों से आम जनता और ट्रांसपोर्टर्स बिल्कुल संतुष्ट नहीं हैं। डिजिटल दुनिया से शुरू हुई यह चिंगारी अब दिल्ली की सड़कों पर एक बड़ा रूप लेने जा रही है। टैक्सी यूनियनों और ट्रांसपोर्ट एसोसिएशनों ने सरकार के इस एकतरफा फैसले के खिलाफ सीधे संसद घेराव का बिगुल फूंक दिया है। चालकों का स्पष्ट आरोप है कि बड़ी कार निर्माता कंपनियां और पेट्रोलियम मंत्रालय मिलकर जनता की जेब पर डाका डाल रहे हैं, क्योंकि धरातल पर वर्ष 2015 या 2018 से पहले की पुरानी गाड़ियों के फ्यूल पंप, रबर पाइप और टैंक जंग लगकर पूरी तरह नष्ट हो रहे हैं।
व्यावसायिक वाहन चालकों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने तुरंत प्रभाव से E20 के रेट में ही सौ प्रतिशत शुद्ध पेट्रोल खरीदने का विकल्प उपलब्ध नहीं कराया, तो देश की राजधानी में चक्का जाम की ऐसी अभूतपूर्व तस्वीर दिखेगी जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी। जनता की मांग सिर्फ कागजी दावों की नहीं, बल्कि किसी निष्पक्ष लैब से इस पूरे ईंधन की वैज्ञानिक जांच कराने की है। जिस अप्रत्याशित रफ्तार से आम नागरिक इस विरोध से जुड़ रहे हैं, उसने यह साफ कर दिया है कि यह मुद्दा अब केवल तकनीकी बहस नहीं, बल्कि आम जनता के वजूद और उनकी मेहनत की कमाई से जुड़ा बड़ा राजनीतिक संग्राम बनने जा रहा है।
---समाप्त---