मुंबई (उत्तराखण्ड तहलका):  बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने हाल ही में एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि नाबालिग पीड़िता के निजी अंगों को छूना भी बलात्कार माना जाएगा, और ऐसे मामलों में नाबालिग का बयान ही दोषी ठहराने के लिए काफी है। यह निर्णय, जिसे जस्टिस निवेदिता मेहता ने सुनाया, बाल यौन शोषण से जुड़े मामलों में मेडिकल साक्ष्यों की कमी की वजह से आरोपी को बरी होने से रोकता है।

मामले का विवरण:

यह मामला महाराष्ट्र के वर्धा जिले के हिंगनघाट इलाके का है, जहाँ एक 38 वर्षीय ड्राइवर ने दो नाबालिग लड़कियों को अमरूद का लालच देकर बुलाया था। आरोपी ने लड़कियों को अश्लील वीडियो दिखाए और उनके प्राइवेट पार्ट छूने की कोशिश की, जिसके बाद लड़कियों ने अपने घर जाकर अपनी माँ को घटना के बारे में बताया। अदालत ने आरोपी को पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत दोषी ठहराया, जिसमें बच्चों के साथ गंभीर यौन हमले के लिए दंड का प्रावधान है।

कोर्ट के मुख्य बिंदु:

बयान ही काफी: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नाबालिग पीड़िता का बयान, यदि विश्वसनीय हो, तो आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त है, भले ही कोई अन्य चश्मदीद गवाह न हो। मेडिकल रिपोर्ट जरूरी नहीं: फैसले में कहा गया है कि यौन हमले के बाद चोट के निशान न मिलना, यह साबित नहीं करता कि कोई अपराध नहीं हुआ है। बच्चों के मामले में अक्सर ऐसा होता है। बलात्कार की व्यापक परिभाषा: कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि नाबालिगों के मामले में, "रेप" या "अत्याचार यौन हमला" के लिए सिर्फ पेनिट्रेशन (शरीर के अंदरूनी हिस्से में प्रवेश) होना ही जरूरी नहीं है, बल्कि यौन इरादे से किया गया कोई भी गलत स्पर्श इस श्रेणी में आ सकता है। यह भी पढ़ें: अमेरिका में फिर से एक भारतीय मूल के व्यक्ति की गोली मारकर हत्या सुप्रीम कोर्ट के अलग विचार: यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला हाल ही में आए कुछ सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से अलग है। सितंबर 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि सिर्फ प्राइवेट पार्ट छूना, बिना पेनिट्रेशन के, पॉक्सो या आईपीसी के तहत "बलात्कार" नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे "यौन हमला" या "शील भंग" के अपराध के रूप में देखा जाएगा। हालाँकि, बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला बताता है कि पेनिट्रेशन के छोटे से प्रयास को भी बलात्कार के बराबर माना जाएगा।

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