हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक मामले और अन्य शैक्षणिक मुद्दों को लेकर विभिन्न छात्र संगठनों और प्रदर्शनकारियों द्वारा जोरदार प्रदर्शन किया गया था। इस प्रदर्शन के दौरान स्थिति उस समय बेहद तनावपूर्ण और हिंसक हो गई जब उग्र भीड़ ने सुरक्षा घेरा तोड़कर संसद की तरफ मार्च करने का गंभीर प्रयास किया। कानून और व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए पुलिस बल को लाठीचार्ज करना पड़ा और आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। इसी पूरे घटनाक्रम और राजनीतिक माहौल के बीच केरल के जाने-माने दक्षिणपंथी एक्टिविस्ट और विचारक टीजी मोहनदास का एक वीडियो सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल गई, जिसके बाद देश भर के राजनीतिक गलियारों में भारी खलबली मच गई।
वायरल हुए वीडियो क्लिप में मोहनदास ने तीखा दावा करते हुए कहा कि यदि उनके हाथों में प्रशासनिक ताकत और अधिकार होता, तो वे जंतर-मंतर के आसपास चार वर्ग किलोमीटर के दायरे में सख्त कर्फ्यू लगा देते। उन्होंने आगे कहा कि वे भीड़ को तितर-बितर करने के लिए तीन बार चेतावनी देते और उसके बाद पुलिस फायरिंग का आदेश देने में भी संकोच नहीं करते। इसके अलावा, वीडियो के एक अन्य बेहद संवेदनशील हिस्से में उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्राओं और महिलाओं को लेकर अत्यंत अभद्र और आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए दावा किया कि जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने वाली महिलाओं को सामूहिक बलात्कार जैसी घटनाओं से भी कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उन्हें इस तरह की चीजें पसंद हैं। उनके इस बयान के साथ ही कुछ अन्य विवादास्पद टिप्पणियां भी तेजी से प्रसारित होने लगीं, जिसके बाद वामपंथी दलों, छात्र संगठनों और धर्मनिरपेक्ष समूहों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। आलोचकों और राजनीतिक विरोधियों का कहना है कि इस तरह के उग्र और अमर्यादित बयान लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों के विरोध प्रदर्शन करने के मौलिक अधिकारों पर सीधा और खतरनाक हमला हैं।
संघ ने किया टीजी मोहनदास के बयान से किनारा
बयान के तूल पकड़ने और चौतरफा आलोचना शुरू होने के बाद राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर भी तेजी से स्पष्टीकरण आने शुरू हो गए। चूंकि टीजी मोहनदास अपने राजनीतिक करियर में भारतीय जनता पार्टी के इंटेलेक्चुअल सेल के संयोजक और भारतीय विचार केंद्रम जैसी संस्थाओं से गहरे तौर पर जुड़े रहे हैं, इसलिए इस विवाद की आंच सीधे तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े वैचारिक संगठनों तक महसूस की जाने लगी। इस संवेदनशील स्थिति की नजाकत को भांपते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तुरंत हस्तक्षेप किया। केरल में आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक एम गणेशन और दक्षिण केरल प्रांत सह-कार्यवाह केबी श्रीकुमार ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा कि मोहनदास की टिप्पणियां पूरी तरह से उनकी अपनी निजी राय हैं। संघ का इस प्रकार की विभाजनकारी सोच या बयानों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है और संगठन ऐसे बयानों का किसी भी रूप में समर्थन नहीं करता है।
टीजी मोहनदास ने क्या कहा?
अपने ऊपर चौतरफा हमलों और बढ़ते राजनीतिक विवाद को देखते हुए टीजी मोहनदास ने भी मीडिया के सामने आकर अपनी स्थिति को विस्तार से स्पष्ट किया। उनका कहना है कि उनके पूरे भाषण के मूल संदर्भ को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए केवल एक से डेढ़ मिनट की छोटी क्लिप को जानबूझकर सनसनीखेज बनाने के लिए वायरल किया गया है। उन्होंने अपनी सफाई में तर्क दिया कि उनका पूरा वक्तव्य और चर्चा मलयालम भाषा के हास्य, व्यंग्य और मुहावरों पर आधारित थी, जिसे अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में अनुवादित करने पर उसका वास्तविक और सहज अर्थ पूरी तरह बदल गया।
मोहनदास ने दृढ़ता के साथ यह स्पष्ट किया कि उन्होंने किसी भी वास्तविक हिंसा या नागरिकों पर अत्याचार का समर्थन नहीं किया था, बल्कि वह केवल हिंसक दंगों और उपद्रव से निपटने के दौरान पुलिस प्रशासन द्वारा अपनाए जाने वाले मानक और काल्पनिक क्रम का एक विवरणात्मक उदाहरण दे रहे थे। उन्होंने यह भी गंभीर आरोप लगाया कि इस पूरे विवाद को सबसे पहले हवा देने के पीछे मीडियावन चैनल और जमात-ए-इस्लामी से जुड़े संगठनों का हाथ है, जिन्होंने सोशल मीडिया पर वामपंथी समर्थकों के साथ मिलकर उनके खिलाफ एक सुनियोजित दुष्प्रचार अभियान चलाया है ताकि उनकी छवि को धूमिल किया जा सके।
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