भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ अध्याय ऐसे होते हैं जो केवल फैसलों की फाइलें बनकर नहीं रह जाते, बल्कि वे व्यवस्था की धीमी गति और उसकी संवेदनाओं पर एक गंभीर सवाल छोड़ जाते हैं। देश के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके निधन के दो साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें तलबीरा-द्वितीय कोयला ब्लॉक आवंटन प्रकरण में पूरी तरह से क्लीन चिट दे दी है। इस फैसले के साथ ही उस ग्यारह साल पुरानी कानूनी लड़ाई का औपचारिक अंत हो गया है, जिसने उनकी निष्ठा और सादगी को लंबे समय तक कठघरे में खड़ा रखा था। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने साल 2015 के उस विशेष अदालत के आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें उन्हें तलब किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीबीआई की विस्तृत जांच में किसी भी प्रकार का आपराधिक मामला सामने नहीं आया था, और दोनों क्लोजर रिपोर्ट सही थीं।

​लेकिन इस कानूनी जीत के बीच एक बेहद चुभने वाला और कड़वा सच यह है कि जिस इंसान को यह राहत मिली है, वह आज इस दुनिया में मौजूद ही नहीं है। जब एक व्यक्ति पूरी जिंदगी अपनी ईमानदारी और देशसेवा की मिसाल पेश करते हुए बिता दे, और जीते जी उसे आरोपों के साये में जीने के लिए मजबूर किया जाए, तो ऐसे में इस प्रकार की देर से मिलने वाली राहत का आखिर क्या औचित्य रह जाता है? क्या अदालत की यह मुहर उनके उन सालों के मानसिक तनाव और प्रतिष्ठा को वापस लौटा सकती है, जो उन्होंने इस झूठे मुकदमे के साये में बिताए थे? यह सवाल केवल एक व्यक्ति विशेष का नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जहाँ न्याय मिलने में इतनी देर हो जाती है कि पीड़ित या आरोपी व्यक्ति खुद न्याय देखने के लिए जीवित नहीं बचता।

​पूरा मामला उस समय का है जब कोयला ब्लॉक आवंटन को लेकर देश भर में राजनीतिक उबाल आया हुआ था। सीबीआई ने अपनी गहन और निष्पक्ष तफ्तीश के बाद अदालत के सामने स्पष्ट रिपोर्ट रखी थी कि डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला नहीं बनता है। इसके बावजूद, विशेष अदालत ने उन्हें मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब अपने फैसले में माना है कि विशेष न्यायाधीश के पास उस वक्त ऐसा कोई भी पर्याप्त कानूनी आधार नहीं था जिसके बल पर वे सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करते। अदालत ने एजेंसी की दोनों रिपोर्टों को स्वीकार कर लिया, जिससे यह साबित हो गया कि वे पूरी तरह से निर्दोष थे और उनके दामन पर लगा हर एक आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद और राजनीतिक शोर का हिस्सा था।

​यह पूरा घटनाक्रम हमें सोचने पर मजबूर करता है कि न्यायपालिका की प्रक्रियाएं इतनी लंबी क्यों होती हैं कि किसी की बेगुनाही साबित होने में एक दशक से ज्यादा का समय लग जाए। डॉ. मनमोहन सिंह जैसी शख्सियत, जिनकी पहचान एक अर्थशास्त्री और एक बेहद शांत, संभ्रांत व ईमानदार नेता के रूप में थी, उन्हें अपने जीवन के अंतिम वर्षों में इस बेबुनियाद कानूनी लड़ाई का सामना करना पड़ा। आज जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पूरी तरह से बरी कर दिया है, तो उनके चाहने वाले और देशवासी यही सोच रहे हैं कि काश यह न्याय उन्हें तब मिला होता जब वे जीवित थे। जीते जी दावों और आरोपों के बीच घिरे रहने वाले एक इंसान को मरने के बाद मिली यह क्लीन चिट न्याय की जीत तो है, लेकिन यह व्यवस्था की उस सुस्ती की कहानी भी कहती है जो समय पर सही फैसला देने में नाकामयाब साबित होती है।


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