सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के सभी पेट्रोल पंपों पर बेचे जा रहे ईंधन में इथेनॉल की सटीक प्रतिशत मात्रा दर्शाने और लेबल अनिवार्य करने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता अपनी शिकायत को लेकर संबंधित सक्षम प्राधिकरण के समक्ष जाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

अधिकार क्षेत्र पर सवाल

​सुनवाई की शुरुआत में ही सर्वोच्च अदालत ने याचिकाकर्ता के सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख करने पर सवाल खड़े किए। पीठ ने पूछा कि इस विषय को लेकर पहले उच्च न्यायालय में याचिका क्यों नहीं दाखिल की गई। अदालत का रुख देखते हुए याचिकाकर्ता वकील नरेंद्र कुमार गोस्वामी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि एक नागरिक के रूप में उन्हें यह जानने का पूरा अधिकार है कि वे जो ईंधन खरीद रहे हैं, उसमें ई20 या इथेनॉल का कितना मिश्रण है, क्योंकि वर्तमान में पंपों पर ऐसी कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती।

सक्षम अथॉरिटी का विकल्प


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​केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। अदालत ने मामले की गंभीरता और प्रक्रियात्मक नियमों को ध्यान में रखते हुए निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर विचार नहीं करेगा। हालांकि पीठ ने अपने आदेश में यह स्पष्ट कर दिया कि याचिकाकर्ता अपनी इस मांग या शिकायत को लेकर संबंधित मंत्रालय या सक्षम संस्था के पास आवेदन करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

इथेनॉल मिश्रण पर बहस

​यह याचिका वकील नरेंद्र कुमार गोस्वामी द्वारा दायर की गई थी, जिसमें केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी कि पेट्रोल पंप की हर नोजल पर इथेनॉल की मात्रा का एक समान और स्पष्ट लेबल लगाया जाए। वर्तमान में देश भर में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण का दायरा तेजी से बढ़ाया जा रहा है, जिससे उपभोक्ताओं के लिए पारदर्शिता की मांग उठ रही थी।

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