संसद के मानसून सत्र के अनिश्चितकालीन समापन के बाद भी इसके औपचारिक सत्रावसान (Prorogation) को अटका कर रखने की सरकारी रणनीति ने देश के राजनीतिक हलकों में तीखा आक्रोश पैदा कर दिया है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के उस भड़काऊ बयान ने आग में घी डालने का काम किया है, जिसमें उन्होंने संसद को बिना नया सत्र बुलाए दोबारा आहूत करने का रास्ता खुला होने की बात कही। इसी को लेकर राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम एक बेहद कड़ा और आक्रामक पत्र जारी कर सरकार की विधायी निष्ठा पर सवाल खड़े किए हैं।

विशेष सत्र की आड़ में बंद कमरों का खेल

​खरगे का यह हमला महज प्रक्रियात्मक आपत्ति नहीं, बल्कि सरकार के कथित गुप्त इरादों पर सीधा प्रहार है। उन्होंने याद दिलाया कि 16 जुलाई को भी उन्होंने प्रधानमंत्री से परिसीमन के भावी स्वरूप पर सर्वदलीय सहमति बनाने की गुहार लगाई थी। ताजा पत्र में उन्होंने बेहद तीखे शब्दों में चेताया कि यदि सरकार चोर दरवाजे से संसद का विशेष सत्र बुलाकर परिसीमन से जुड़े संदेहास्पद प्रस्तावों को पास कराने का मन बना रही है, तो यह लोकतांत्रिक मर्यादाओं का चीरहरण होगा। खरगे ने स्पष्ट मांग रखी कि सरकार अपने परिसीमन प्लान के हर पन्ने को सभी राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों के सामने रखे, ताकि इस संवेदनशील मसले पर विस्तृत पड़ताल की जा सके।

सीटों की संख्या 25 वर्षों तक फ्रीज करने की खुली मांग 

​कांग्रेस पार्टी ने केंद्र के संभावित विधायी बुलडोजर का मुकाबला करने के लिए अपनी ढाल पूरी तरह मजबूत कर ली है। खरगे ने सरकार को सीधी चुनौती देते हुए मांग की कि लोकसभा की 543 सीटों की कुल संख्या और राज्यों के बीच उनके आवंटन के अनुपात को अगले 25 वर्षों तक पूरी तरह फ्रीज कर दिया जाए। इसके साथ ही उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यदि सरकार महिला आरक्षण को लेकर वास्तव में गंभीर है, तो इसे 2029 के चुनावों से ही लागू करे, लेकिन इसके लिए सीटों के आनुपातिक गणित से छेड़छाड़ या नए परिसीमन की आड़ न ली जाए।

पत्र में दिलाई​17 अप्रैल की रात की याद

​विपक्ष का यह तीखा रुख हवा में नहीं है, बल्कि इसके पीछे इसी वर्ष 17 अप्रैल 2026 की उस ऐतिहासिक रात की कड़वी यादें छिपी हैं जब सरकार का संवैधानिक दांव उल्टा पड़ गया था। उस समय सरकार परिसीमन का नया दायरा तय करने और लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 850 तक करने के प्रावधान वाले 131वें संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने का प्रयास कर रही थी।


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​उस रात सदन में हुए भारी संग्राम और वोटिंग के दौरान सरकार का दंभ चूर-चूर हो गया। वोट डालने वाले 528 सांसदों में से विपक्ष ने गोलबंद होकर विधेयक के खिलाफ 230 वोट झोंक दिए, जबकि पक्ष में 298 वोट ही पड़ सके। दो-तिहाई विशेष बहुमत (352 वोट) का जादुई आंकड़ा न छू पाने के कारण विधेयक संसद के पटल पर गिर गया था। खरगे ने उसी असफलता की याद दिलाते हुए सख्त लहजे में लिखा कि सरकार अप्रैल की उस रात की तरह दोबारा विधायी तानाशाही का बुलडोजर चलाने की कोशिश कतई न करे।

उत्तर बनाम दक्षिण का विस्फोटक विवाद

​विधेयक के गिरने के पीछे केवल संख्याबल का गणित नहीं था, बल्कि देश के संघीय ढांचे में पैदा हुआ वह गहरा दरार था जो परिसीमन के नाम पर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच खड़ा कर दिया गया है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों का खुला आरोप है कि दशकों तक राष्ट्रीय हित में जनसंख्या पर लगाम कसने का खामियाजा उन्हें अपनी लोकसभा सीटें गंवाकर क्यों चुकाना पड़े?

​यदि जनसंख्या को ही आधार बनाकर सीटें बांटी गईं तो उत्तर भारत के अधिक आबादी वाले राज्यों का पलड़ा भारी हो जाएगा और देश की सत्ता का संतुलन हमेशा के लिए बिगड़ जाएगा। खरगे ने साफ कर दिया कि बिना क्षेत्रीय संतुलन और राज्यों की संप्रभुता का सम्मान किए किसी भी एकतरफा फैसले को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हालांकि सरकार नुकसान न होने की बात दोहराती रही है, लेकिन सत्रावसान में अनसुलझी देरी ने दिल्ली के राजनीतिक पारे को चरम पर पहुंचा दिया है।

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