तमिलनाडु की धरती पर पिछले पांच दशकों से जिस द्रविड़ विचारधारा का एकछत्र राज था, आज उसके बुर्ज ढहते नजर आ रहे हैं। अभिनेता विजय की पार्टी 'तमिलगा वेट्टी कझगम' यानी TVK ने 108 सीटों पर कब्जा जमाकर इतिहास रच दिया है। यह जीत केवल सीटों का आंकड़ा नहीं है, बल्कि उस जनता का आक्रोश है जो दशकों से दो ही परिवारों के बीच पिस रही थी। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का अपनी पारंपरिक कोलाथुर सीट से हारना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि जनता अब कोरे आश्वासनों से ऊब चुकी है। विजय ने अपनी रैलियों में जिस बदलाव की हुंकार भरी थी, आज उसकी गूंज चेन्नई के फोर्ट सेंट जॉर्ज की दीवारों तक सुनाई दे रही है। हालांकि, सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद विजय अभी बहुमत के जादुई आंकड़े 118 से 10 सीटें दूर हैं।
किस दल के पास कितना संख्या बल
तमिलनाडु की 234 सदस्यीय विधानसभा के अंतिम परिणाम घोषित हो चुके हैं, जिसने राज्य की सत्ता का संतुलन पूरी तरह बदल दिया है। वर्तमान में पार्टी-वार सीटों की स्थिति नीचे दिए गए चार्ट के अनुसार है:
| पार्टी का नाम | जीती गई सीटें |
|---|---|
| तमिलगा वेट्टी कझगम (TVK) | 108 |
| द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) | 59 |
| अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (AIADMK) | 47 |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 5 |
| पट्टाली मक्कल काची (PMK) | 4 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) | 2 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (CPI-M) | 2 |
| विदुथलाई चिरुथैगल काची (VCK) | 2 |
| इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) | 2 |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 1 |
| अन्य (DMDK, AMMK आदि) | 2 |
| कुल सीटें | 234 |
क्या हो सकता है विजय का बहुमत गणित
विजय के लिए सत्ता का रास्ता गठबंधन की गलियों से होकर गुजरता है। उन्हें 118 का आंकड़ा छूने के लिए कांग्रेस के 5 विधायकों का समर्थन मिलना लगभग तय माना जा रहा है। इसके अलावा पट्टाली मक्कल काची के 4 विधायक और 2 अन्य निर्दलीयों का साथ मिलते ही विजय 119 के आंकड़े पर पहुंच जाएंगे, जो बहुमत के लिए पर्याप्त है। चर्चा यह भी है कि विदुथलाई चिरुथैगल काची और मुस्लिम लीग जैसे दल भी पाला बदल सकते हैं। विजय के रणनीतिकार फिलहाल इन छोटे दलों के संपर्क में हैं और उन्हें कैबिनेट में जगह देने का प्रलोभन दिया जा रहा है। यदि विजय इन 10 विधायकों के समर्थन पत्र जुटाने में सफल रहते हैं, तो वे तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे।
राज्यपाल का विशेषाधिकार और राष्ट्रपति शासन का संकट
यदि विजय निर्धारित समय सीमा के भीतर बहुमत साबित करने में नाकाम रहते हैं, तो गेंद राज्यपाल आर.एन. रवि के पाले में चली जाएगी। राज्यपाल का पहला संवैधानिक कर्तव्य यह देखना होगा कि क्या कोई अन्य गठबंधन, जैसे डीएमके और अन्नाद्रमुक मिलकर सरकार बना सकते हैं। हालांकि, इन दोनों धुर विरोधियों का साथ आना नामुमकिन सा लगता है। ऐसी स्थिति में यदि कोई भी दल सरकार बनाने का दावा पेश नहीं कर पाता है, तो राज्यपाल अनुच्छेद 356 के तहत केंद्र को अपनी रिपोर्ट भेज सकते हैं। इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो सकता है और विधानसभा को भंग कर फिर से चुनाव की नौबत आ सकती है। तमिलनाडु इस समय एक ऐसे मोड़ पर है जहां या तो नया इतिहास रचा जाएगा या फिर प्रशासनिक अनिश्चितता का लंबा दौर शुरू होगा।
---समाप्त---