पश्चिम बंगाल की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां लोकतंत्र और सत्ता का अहंकार आमने-सामने हैं। हालिया चुनाव परिणामों में भाजपा द्वारा 207 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल करने के बावजूद, निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पद त्यागने से साफ मना कर दिया है। कोलकाता में आयोजित एक प्रेस वार्ता में उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि वह इस्तीफा नहीं देंगी, क्योंकि वह हारी नहीं हैं। ममता बनर्जी का यह रुख सीधे तौर पर उन लोकतांत्रिक परंपराओं पर प्रहार है जहां हार स्वीकार करना और सत्ता का हस्तांतरण एक पवित्र प्रक्रिया मानी जाती है। उन्होंने चुनाव आयोग और केंद्रीय बलों पर मिलीभगत का आरोप लगाते हुए इसे जनता का फैसला मानने से इनकार कर दिया है। यह जिद केवल एक राजनीतिक दल की हार को नकारने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस संवैधानिक तंत्र को सीधी चुनौती है जिसके तहत चुनाव संपन्न कराए गए।
वैधानिक शून्य की ओर बढ़ता बंगाल
बंगाल के प्रशासनिक गलियारों में इस समय सन्नाटा है लेकिन राजभवन में हलचल तेज हो गई है। संविधान के जानकारों का स्पष्ट मत है कि एक बार चुनाव परिणाम घोषित होने और बहुमत मिलने के बाद राज्यपाल का कर्तव्य बनता है कि वह नई सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त करें। यदि निवर्तमान मुख्यमंत्री संवैधानिक शिष्टाचार का पालन करते हुए इस्तीफा नहीं सौंपती हैं, तो राज्यपाल के पास अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करने या मुख्यमंत्री को बर्खास्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। भाजपा नेतृत्व ने इसे 'संवैधानिक तख्तापलट' की कोशिश करार दिया है। टीएमसी का तर्क है कि जब तक धांधली के आरोपों की अदालती जांच नहीं हो जाती, तब तक वे सत्ता नहीं छोड़ेंगे। यह स्थिति राज्य में एक खतरनाक प्रशासनिक गतिरोध पैदा कर रही है, जहां कानून-व्यवस्था और सरकारी मशीनरी अब असमंजस की स्थिति में है कि वे किसका आदेश मानें।
इससे पूर्व भी हो चुका है ऐसा
भारतीय राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब किसी मुख्यमंत्री ने विपरीत परिस्थितियों में कुर्सी बचाने के लिए संविधान की सीमाओं को चुनौती दी हो। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 2024 में जेल के भीतर से सरकार चलाने का प्रयास कर एक नया कानूनी विवाद छेड़ दिया था, जहां उन्होंने दबाव के बावजूद महीनों तक इस्तीफा नहीं दिया। बिहार में लालू प्रसाद यादव ने चारा घोटाले में दोषी ठहराए जाने तक सत्ता नहीं छोड़ी थी और अंत में अपनी पत्नी को कमान सौंपी। झारखंड में हेमंत सोरेन ने भी गिरफ्तारी की दहलीज तक पहुंचने तक पद नहीं त्यागा। इसी तरह, 1990 के दशक में कर्नाटक के एस. आर. बोम्मई का मामला भी चर्चित रहा था जहां बहुमत के परीक्षण को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई चली थी। हालांकि, ममता बनर्जी का वर्तमान मामला इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि यहां किसी आपराधिक जांच के बजाय सीधे चुनावी हार को ही स्वीकार करने से इनकार कर दिया गया है।
लोकतंत्र की गरिमा और भविष्य के संवैधानिक खतरे
अगर यह सिलसिला जारी रहा तो भारत की संसदीय प्रणाली के लिए एक गलत नजीर पेश होगी। पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग और सुरक्षा बलों को 'खलनायक' बताकर ममता बनर्जी ने न केवल संस्थानों की गरिमा कम की है, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं को भी सड़कों पर उतरने का इशारा कर दिया है। राज्य में हिंसा की सुगबुगाहट तेज हो रही है और नागरिक समाज इस अनिश्चितता से डरा हुआ है। यह तकरार अब केवल कुर्सी की नहीं रह गई है, बल्कि यह इस बात की परीक्षा है कि देश का संविधान किसी व्यक्ति विशेष की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के आगे कितना मजबूत है। यदि आने वाले कुछ घंटों में ममता बनर्जी राजभवन जाकर अपना त्यागपत्र नहीं सौंपती हैं, तो बंगाल में केंद्रीय हस्तक्षेप अपरिहार्य हो जाएगा, जिसके परिणाम दूरगामी और बेहद कटु हो सकते हैं।
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