भारतीय न्याय प्रणाली की खामियों और तकनीकी उलझनों का एक बेहद गंभीर और संवेदनशील मामला सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 22 साल से जेल में बंद एक ऐसे व्यक्ति को पूरी तरह बरी कर दिया, जिसे एक गलत आरोप में दोषी ठहराया गया था। यह मामला इस बात का कड़वा सच बयां करता है कि कैसे न्याय की आस लगाए बैठे किसी गरीब व्यक्ति को कभी-कभी खुद न्यायपालिका के रुख से भारी निराशा झेलनी पड़ती है।

​इस पूरी त्रासदी की शुरुआत तब हुई जब पुलिस ने महज शक के आधार पर एक व्यक्ति को हिरासत में लिया। कथित तौर पर थर्ड-डिग्री हथकंडों का इस्तेमाल करके उससे एक ऐसा कबूलनामा हासिल किया गया, जिसकी कानूनी रूप से कोई मान्यता नहीं थी। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट प्रस्तुत सबूतों का सही और निष्पक्ष मूल्यांकन करने में पूरी तरह नाकाम रहा और उसे आजीवन कारावास की सजा सुना दी।

​जब याचिकाकर्ता ने 12 साल जेल में बिताने के बाद जेल के माध्यम से हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो उसे वहां भी न्याय नहीं मिला। हाई कोर्ट ने अपील दाखिल करने में 3,157 दिनों की देरी का हवाला देते हुए इसे तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया। अदालत के इस मूकदर्शक बने रहने वाले रवैये के कारण उस निर्दोष व्यक्ति को अपनी जिंदगी के 10 और अनमोल साल सलाखों के पीछे गुजारने पड़े।

​सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस पूरे घटनाक्रम और हाई कोर्ट के आदेश पर गहरा दुख और निराशा व्यक्त की। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब मामला जेल से भेजी गई अपील का हो, तो अदालतों को व्यावहारिक, उदार और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। जब देश की व्यवस्था गरीबों तक न्याय पहुंचाने का प्रयास कर रही है, तब देरी चाहे कितनी भी हो, अदालतों को सक्रिय भूमिका निभाते हुए उसे माफ कर देना चाहिए ताकि मेरिट के आधार पर सुनवाई हो सके।


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​अंततः सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बिना किसी भरोसेमंद और ठोस सबूत के एक बेगुनाह इंसान की जिंदगी के 22 साल बर्बाद हो गए। यह फैसला हमारे समाज के पिछड़े और कमजोर वर्गों के लिए न्याय पाने में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों पर एक गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है।

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