दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन के बाद 'कॉकरोच जनता पार्टी' और उसके संस्थापक अभिजीत दिपके एक बड़ी कानूनी मुश्किल में फंसते दिख रहे हैं। दूसरों पर आरोप लगाने के लिए जाने जाने वाले अभिजीत दिपके के खिलाफ अधिवक्ता रिंकी चटर्जी की शिकायत पर Zero FIR दर्ज की गई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि प्रदर्शन के दौरान एक नाबालिग की भागीदारी कराई गई, जिसके आधार पर POCSO Act समेत अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत सख्त कार्रवाई की मांग की गई है।
विरोध प्रदर्शन और बच्चों की भागीदारी पर कानून क्या कहता है?
भारत का संविधान अपने नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का मौलिक अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूरी तरह से असीम नहीं है।
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि किसी प्रदर्शन में बच्चों या नाबालिगों की सुरक्षा प्रभावित होने की बात सामने आती है, तो प्रशासन के पास इसकी जांच करने का पूरा अधिकार है। हर मामले के कानूनी और व्यावहारिक तथ्य अलग होते हैं, और अदालतें भी परिस्थितियों का मूल्यांकन करने के बाद ही कोई निर्णय सुनाती हैं।
किसी भी प्रदर्शन में किसी नाबालिग की महज मौजूदगी अपने आप में कोई अपराध नहीं है। यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि वहां क्या परिस्थितियां थीं और कौन से लीगल फैक्टर्स मौजूद थे। यही वजह है कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष तथ्यात्मक जांच सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।
क्या अभिजित दिपके की होगी गिरफ्तारी
POCSO जैसे संवेदनशील कानूनों से जुड़े मामलों में सबसे पहले संबंधित पुलिस अपनी जांच शुरू करती है और प्राथमिक साक्ष्यों का मूल्यांकन करती है। प्रक्रिया के तहत जरूरत पड़ने पर संबंधित व्यक्तियों को पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता है।
कानून के मुताबिक, अगर मामला बेहद गंभीर पाया जाता है या फिर आरोपी द्वारा साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने अथवा गवाहों को प्रभावित करने की आशंका होती है, तो पुलिस आरोपी को गिरफ्तार भी कर सकती है। इस मामले में भी डिजिटल सामग्री, वीडियो फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान जांच का अहम हिस्सा बनेंगे। हालांकि, अंतिम फैसला केवल अदालत ही दे सकती है, और तब तक सभी आरोप जांच व न्यायिक परीक्षण के अधीन रहेंगे।
Zero FIR क्या है और इस मामले में इसकी भूमिका क्यों अहम है?
Zero FIR एक ऐसी विशेष कानूनी व्यवस्था है जिसके तहत किसी भी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की सूचना मिलने पर देश के किसी भी पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है, भले ही घटना उस थाने के अधिकार क्षेत्र में न हुई हो।
इसका प्राथमिक उद्देश्य अपराध की सूचना मिलते ही बिना किसी देरी के त्वरित कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना होता है। प्रक्रिया के अनुसार, मामला दर्ज करने के बाद इसे संबंधित क्षेत्राधिकार वाले पुलिस थाने को ट्रांसफर कर दिया जाता है। इस मामले में भी शिकायतकर्ता ने इसी कानूनी व्यवस्था का उपयोग किया है ताकि जांच में देरी न हो। हालांकि, Zero FIR दर्ज होने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति दोषी साबित हो गया है—आगे की जांच और सबूतों के आधार पर ही पुलिस अंतिम निर्णय लेती है।
शिकायत में POCSO Act का उल्लेख क्यों किया गया?
गौरतलब है कि POCSO Act मुख्य रूप से बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया एक विशेष कानून है। अभिजीत दिपके के खिलाफ दी गई शिकायत में प्राथमिक आधार प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर एक नाबालिग की मौजूदगी को बनाया गया है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन स्थल पर अश्लील भाषा का इस्तेमाल हुआ। ऐसे माहौल में नाबालिग या अल्पवयस्क बच्चियों को आने की इजाजत कैसे दी गई और उन्हें वहां कौन लाया, इसे लेकर सवाल उठाए गए हैं। शिकायत में दावा किया गया है कि यह बाल संरक्षण संबंधी कानूनों का सीधा उल्लंघन है और अभिजीत दिपके आयोजक होने के नाते इसके मुख्य जिम्मेदार हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि केवल शिकायत में किसी कानून का उल्लेख कर देने से वह स्वतः लागू नहीं हो जाता; धाराओं का निर्धारण पूरी तरह से पुलिस जांच के तथ्यों पर निर्भर करेगा।
अभिजीत दिपके का पक्ष क्या है?
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अभिजीत दिपके ने सार्वजनिक रूप से इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे 'राजनीतिक रूप से प्रेरित कार्रवाई' करार दिया है।
दिपके का आरोप है कि लोकतांत्रिक तरीके से विरोध प्रदर्शन करने वालों को चुनिंदा अंदाज में निशाना बनाया जा रहा है। उनके मुताबिक, पूरा आंदोलन पूरी तरह से संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे में रहकर चलाया गया था। हालांकि, उनके इन दावों की किसी न्यायिक मंच पर स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, वहीं पुलिस का कहना है कि मामले की विस्तृत जांच अभी जारी है।
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