​राजधानी की कानूनी व्यवस्था के गलियारों से एक ऐसा सच सामने आया है जिसने न्याय के मंदिर की सुरक्षा और शुचिता पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। दिल्ली बार काउंसिल (बीसीडी) द्वारा हाल ही में अदालत में पेश किए गए आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि पूरी न्यायिक प्रणाली को सतर्क करने वाले भी हैं। पिछले महज दो वर्षों के भीतर फर्जी कानून की डिग्रियों के आधार पर वकील के रूप में नामांकन कराने वाले गिरोहों के खिलाफ 160 से अधिक प्राथमिकी दर्ज की गई हैं। यह विशाल आंकड़ा इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि एक गहरा 'दीमक' हमारी कानूनी व्यवस्था को भीतर से खोखला कर रहा है। यह मामला अब महज व्यक्तिगत धोखाधड़ी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि एक सुव्यवस्थित संस्थागत भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।
​जांच में यह स्पष्ट होकर उभरा है कि यह पूरा गोरखधंधा एक 'पैरेलल इकोसिस्टम' यानी समानांतर व्यवस्था की तरह काम कर रहा है। बीसीडी के खुलासे बताते हैं कि इस रैकेट के पीछे एक त्रिकोणीय सांठगांठ सक्रिय है, जिसमें बिचौलिए, बार काउंसिल के भीतर मौजूद कुछ संदिग्ध कर्मचारी और जाली डिग्री धारक शामिल हैं। दलाल उन लोगों को रातों-रात वकील बनाने का सपना बेचते हैं जिनके पास आवश्यक योग्यता नहीं है, वहीं संस्था के भीतर बैठे कुछ 'विभीषण' मोटी रकम के बदले इन फर्जी दस्तावेजों को सत्यापन की प्रक्रिया से सुरक्षित बाहर निकालने का रास्ता साफ करते हैं। अंततः, ये फर्जी उम्मीदवार अदालत कक्षों में खड़े होकर न केवल कानून का अभ्यास करते हैं, बल्कि पूरी न्याय प्रक्रिया का उपहास भी उड़ाते हैं।
​इस खुलासे ने अखिल भारतीय बार परीक्षा (एआईबीई) और वर्तमान सत्यापन प्रक्रिया की कमियों को भी उजागर कर दिया है। एआईबीई का उद्देश्य पेशे में गुणवत्ता सुनिश्चित करना था, लेकिन यदि मूल एलएलबी डिग्री ही जाली है और उसे शुरुआती स्तर पर नहीं पकड़ा जाता, तो उसके बाद की सभी परीक्षाएं और औपचारिकताएं बेमानी हो जाती हैं। वर्तमान में विश्वविद्यालयों और बार काउंसिलों के बीच डेटा साझा करने और सत्यापन करने की प्रक्रिया में जो भारी खामियां हैं, उनका भरपूर फायदा इस सिंडिकेट द्वारा उठाया जा रहा है। जब एक अयोग्य व्यक्ति वकील बनकर पैरवी करता है, तो इसका सीधा प्रहार न्याय की गुणवत्ता पर होता है। इससे न केवल मुवक्किलों को अपनी संपत्ति और स्वतंत्रता का नुकसान उठाना पड़ता है, बल्कि अदालतों का कीमती समय भी गलत दलीलों और कानूनी अज्ञानता के कारण बर्बाद होता है।
​इस गंभीर स्थिति पर न्यायपालिका ने भी कड़ा रुख अपनाया है। दिल्ली की एक अदालत द्वारा आरोपी वकील की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करना इस दिशा में एक 'जीरो टॉलरेंस' का संदेश है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून का अभ्यास करना कोई जन्मजात अधिकार नहीं, बल्कि एक अर्जित विशेषाधिकार है जिसे केवल ईमानदारी और योग्यता से प्राप्त किया जा सकता है। जालसाजी के इन मामलों को अब केवल व्यावसायिक कदाचार नहीं, बल्कि गंभीर आपराधिक कृत्य की श्रेणी में रखकर देखा जा रहा है।
​समाधान की दिशा में अब केवल एफआईआर दर्ज करना या लाइसेंस रद्द करना ही पर्याप्त नहीं होगा। इस समस्या को जड़ से मिटाने के लिए पूरी नामांकन प्रक्रिया के डिजिटलीकरण की आवश्यकता है, जिसमें बार काउंसिल के डेटाबेस को सीधे विश्वविद्यालयों के 'नेशनल एकेडमिक डिपॉजिटरी' से जोड़ा जाए। साथ ही, पिछले कुछ वर्षों में हुए सभी नामांकनों का सघन ऑडिट और बार काउंसिल के भीतर की सफाई अनिवार्य हो गई है। यह समय कानूनी पेशे की गरिमा को बचाने के लिए एक 'सर्जिकल स्ट्राइक' का है, ताकि काले कोट की आड़ में छिपे सफेदपोश अपराधियों को इस पवित्र पेशे से बाहर का रास्ता दिखाया जा सके और आम जनता का न्यायपालिका पर भरोसा अडिग रहे।


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