महरौली के शांत इलाके में स्थित पर्यावरण कॉम्प्लेक्स की वह सुबह किसी ने नहीं सोचा था कि एक मातम लेकर आएगी। दिल्ली की कड़ाके की ठंड से बचने के लिए एक डॉक्टर दंपत्ति ने जो तरीका अपनाया वही उनके जीवन का अंतिम निर्णय साबित हुआ। पेशे से डॉक्टर होने के बावजूद डॉ. अविनाश प्रसाद और उनकी पत्नी प्रेरणा को अंदाजा भी नहीं था कि जिस गैस हीटर के सहारे वे सुकून की नींद लेने जा रहे हैं वह कभी न टूटने वाली नींद में तब्दील हो जाएगा। पुलिस को जब घर का दरवाजा तोड़कर अंदर प्रवेश करना पड़ा तो मंजर बेहद खौफनाक था। दोनों बिस्तर पर बेजान पड़े थे और कमरे का वातावरण एक जहरीली गैस के चैंबर में तब्दील हो चुका था।

ठंड से बचने की चाहत और वह घातक भूल

सर्दियों के मौसम में तापमान गिरने पर अक्सर लोग अपने घरों को पूरी तरह से सील कर देते हैं। इस डॉक्टर परिवार ने भी ठंड को कमरे से बाहर रखने के लिए खिड़कियों और दरवाजों की दरारों तक को बंद कर दिया था। कमरे के भीतर गैस हीटर पूरी रात जलता रहा। इस प्रक्रिया में कमरे के भीतर मौजूद जीवनदायिनी ऑक्सीजन धीरे-धीरे जलकर खत्म हो गई। जैसे ही ऑक्सीजन का स्तर कम हुआ हीटर ने कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीली गैस छोड़ना शुरू कर दिया। इस गैस की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसकी न तो कोई गंध होती है और न ही कोई रंग। यह गैस रक्त के हीमोग्लोबिन में मिलकर शरीर के अंगों तक ऑक्सीजन की सप्लाई को पूरी तरह ठप कर देती है।

डॉक्टर परिवार भी नहीं भांप सका मौत की दस्तक

हैरानी की बात यह है कि डॉ. अविनाश स्वयं चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े थे लेकिन कार्बन मोनोऑक्साइड का असर इतना धीमा और गहरा होता है कि इंसान को बचाव का मौका ही नहीं मिलता। जब यह गैस फेफड़ों के जरिए शरीर में प्रवेश करती है तो व्यक्ति को हल्की सुस्ती महसूस होती है जिसे वह नींद समझकर नजरअंदाज कर देता है। धीरे-धीरे मस्तिष्क को ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाती है और इंसान गहरी बेहोशी में चला जाता है। इस मामले में भी यही हुआ। दंपत्ति को न तो किसी शोर का आभास हुआ और न ही उन्हें सांस लेने में होने वाली तकलीफ ने जगाया। वे बस सोते ही रह गए जबकि उनके शरीर के भीतर का सिस्टम ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ रहा था।

क्या कहता है फॉरेंसिक और मेडिकल विज्ञान

विशेषज्ञों के अनुसार जब भी किसी बंद जगह पर कोई चीज जलती है तो वह वातावरण की ऑक्सीजन का उपभोग करती है। गैस आधारित हीटर बिजली वाले हीटर के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से ऑक्सीजन सोखते हैं। महरौली की इस घटना में फॉरेंसिक टीम ने पाया कि हीटर का स्विच ऑन था और कमरे में वेंटिलेशन का नामोनिशान नहीं था। इसे चिकित्सा की भाषा में 'एस्फिक्सिएशन' कहा जाता है जिसमें ऑक्सीजन के अभाव में शरीर के टिश्यू काम करना बंद कर देते हैं। यह घटना एक कड़ा सबक है कि बंद कमरे में हीटर या अंगीठी चलाना सीधे तौर पर मौत को दावत देना है। सुरक्षा के लिहाज से यह अनिवार्य है कि हीटर चलाते समय कमरे का कोई न कोई हिस्सा हवा के आवागमन के लिए खुला रखा जाए।


Advertisement

---समाप्त---