देश की राजधानी दिल्ली के लुटियंस जोन में स्थित यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया यानी यूएनआई का मुख्यालय अब खामोश हो गया है। दशकों तक देश-दुनिया की खबरों का केंद्र रहे इस दफ्तर को खाली कराने की कार्रवाई ने पत्रकारिता जगत में हलचल पैदा कर दी है। यह कदम अचानक नहीं उठाया गया बल्कि इसके पीछे लंबे समय से चल रहा कानूनी और वित्तीय विवाद मुख्य कारण बताया जा रहा है। भूमि एवं विकास कार्यालय ने अपनी शर्तों के उल्लंघन और वित्तीय देनदारियों को आधार बनाकर इस बेशकीमती जमीन से संस्थान को बेदखल करने का निर्णय लिया है।
आर्थिक बदहाली और बकाया टैक्स
यूएनआई पिछले काफी समय से गंभीर आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रही है। जानकारी के मुताबिक संस्थान पर नगर निगम और संबंधित विभाग का करोड़ों रुपये का संपत्ति कर और लीज रेंट बकाया था। विभाग द्वारा कई बार नोटिस जारी कर भुगतान की मांग की गई थी लेकिन वित्तीय संसाधनों के अभाव में एजेंसी इसे जमा करने में विफल रही। बकाया राशि का आंकड़ा इतना बढ़ गया कि विभाग ने अंततः परिसर को अपने कब्जे में लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी। यह केवल एक दफ्तर का खाली होना नहीं है बल्कि एक बड़े संस्थान के चरमराते ढांचे की कहानी बयां करता है।
कर्मचारियों के भविष्य पर संकट
दफ्तर खाली कराए जाने के बाद वहां काम करने वाले पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। पहले से ही वेतन की अनियमितताओं से जूझ रहे स्टाफ के लिए अब कार्यस्थल का छिन जाना किसी दोहरी मार से कम नहीं है। हालांकि संस्थान के प्रबंधन की ओर से स्थिति को संभालने के प्रयास की बातें कही जा रही हैं लेकिन मुख्यालय का इस तरह बंद होना एजेंसी की साख पर भी बड़ा सवालिया निशान लगाता है। इस कार्रवाई ने दिल्ली के प्रशासनिक गलियारों में भी चर्चा छेड़ दी है कि क्या पुरानी और विश्वसनीय एजेंसियों का अस्तित्व अब खतरे में है।
अंतिम कानूनी कार्रवाई का असर
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि लीज की शर्तों के अनुसार यदि कोई संस्थान समय पर सरकारी बकाया और आवंटित भूमि का किराया नहीं भरता है तो सरकार को उसे वापस लेने का पूरा अधिकार होता है। यूएनआई के मामले में भी इसी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है। भारी पुलिस बल और संबंधित अधिकारियों की मौजूदगी में इस कार्रवाई को अंजाम दिया गया ताकि किसी भी प्रकार के विरोध की स्थिति को संभाला जा सके। फिलहाल एजेंसी के कामकाज को वैकल्पिक माध्यमों से चलाने की कोशिश की जा रही है लेकिन मुख्य कार्यालय का जाना संस्थान के लिए एक अपूरणीय क्षति साबित हो रही है।
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