लुटियंस दिल्ली के सबसे सुरक्षित और रसूखदार इलाके में पसरा सन्नाटा इन दिनों सत्ता के गलियारों में एक नई बहस का केंद्र बन चुका है। प्रधानमंत्री आवास के ठीक बगल में स्थित लगभग साढ़े सत्ताइस एकड़ की इस बेहद कीमती जमीन पर फैले दिल्ली जिमखाना क्लब को खाली करने का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने लीज डीड के सख्त नियमों का इस्तेमाल करते हुए इस क्लब की लीज को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया है। प्रशासन ने साफ आदेश दिया है कि आगामी जून की पांच तारीख तक यह पूरा परिसर खाली कर सरकार को सौंप दिया जाए। सरकार का आधिकारिक रुख स्पष्ट है कि इस अति-संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र का इस्तेमाल अब कुछ गिने-चुने रईसों के मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि देश के रक्षा बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और जरूरी प्रशासनिक मंत्रालयों के विस्तार के लिए किया जाएगा। इस अचानक आए आदेश के बाद देश के इस सबसे प्रतिष्ठित और पुराने क्लब का इतिहास, इसके बंद दरवाजों के पीछे चलने वाला विशेषाधिकारों का खेल, दशकों पुराना जासूसी कांड और वर्तमान राजनीतिक टकराव एक बार फिर खुलकर देश के सामने आ गया है।

औपनिवेशिक विरासत और बंद दरवाजों के पीछे का एलीट कल्चर

​इस क्लब की स्थापना ब्रिटिश शासन के दौरान जुलाई 1913 में हुई थी। तब इसका नाम इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब हुआ करता था, जो ब्रिटिश हुक्मरानों, वायसराय और भारतीय राजा-महाराजाओं का सबसे पसंदीदा अड्डा था। स्वतंत्रता के बाद देश बदला, लेकिन क्लब का मिजाज नहीं बदला। नाम से इम्पीरियल शब्द जरूर हटा दिया गया, लेकिन इसके भीतर की औपनिवेशिक सोच और एलीट कल्ट वैसे ही बरकरार रहे। शानदार लॉन, आलीशान इमारतें और विश्वस्तरीय टेनिस कोर्ट से सजे इस क्लब की मेंबरशिप पाना देश के आम नागरिकों के लिए हमेशा से एक सपने जैसा रहा है। इसके सदस्यों में देश के शीर्ष नौकरशाह, सेना के उच्चाधिकारी, कद्दावर राजनेता और पुश्तैनी उद्योगपति शामिल रहे हैं। इस क्लब पर लंबे समय से यह आरोप लगते रहे कि यह लोकतांत्रिक भारत के भीतर विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का एक समानांतर टापू बन चुका है। क्लब के भीतर सदस्यता देने के लिए एक खास फार्मूला अपनाया जाता था, जिसके तहत चालीस फीसदी सीटें कार्यरत या सेवानिवृत्त शीर्ष नौकरशाहों और सैन्य कमांडरों के लिए सुरक्षित थीं। वहीं अन्य चालीस फीसदी सीटें मौजूदा सदस्यों के बच्चों यानी विरासत कोटे के लिए आरक्षित रखी जाती थीं, जिसे आलोचकों ने भाई-भतीजावाद का नाम दिया। देश के आम सक्षम नागरिकों या नए प्रोफेशनल्स के लिए महज बीस फीसदी का झरोखा ही खुला था। इस व्यवस्था के कारण किसी आम रसूखदार व्यक्ति को भी मेंबरशिप के लिए तीस से पैंतीस साल तक का लंबा इंतजार करना पड़ता था।

सदस्यता के नाम पर करोड़ों रुपये की हेराफेरी

​इसी अपारदर्शी व्यवस्था और सदस्यता के नाम पर करोड़ों रुपये की हेराफेरी के आरोपों के बाद साल 2022 में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने इस पर सख्त रुख अपनाया था। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की जांच में यह सामने आया कि बाहरी आवेदकों से एडवांस फीस के रूप में करोड़ों रुपये जमा कराकर उन्हें दशकों तक वेटिंग लिस्ट में रखा गया, और उस पैसे का इस्तेमाल क्लब के भीतर मौजूद वीआईपी सदस्यों के खान-पान, शराब और ऐशो-आराम की सब्सिडी के लिए किया जा रहा था। कंपनी कानून के गंभीर उल्लंघन के कारण अदालत ने इसका पुराना प्रबंधन सस्पेंड कर इसे सरकारी नियंत्रण में सौंप दिया था, जिसके बाद से इसे एक प्रशासक समिति चला रही थी।

जब कूमर नारायण जासूसी कांड ने हिला दी थी देश की सत्ता

​इस क्लब का विवादों से नाता नया नहीं है। देश के इतिहास में दर्ज सबसे बड़े राष्ट्रीय सुरक्षा घोटालों में से एक, जिसे कूमर नारायण जासूसी कांड या मोल इन द पीएमओ कहा जाता है, उसके तार सीधे तौर पर दिल्ली जिमखाना क्लब से जुड़े हुए थे। साल 1984 और 1985 के दौरान जब देश के प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी ने कार्यभार संभाला था, तब इंटेलिजेंस ब्यूरो ने एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय जासूसी रैकेट का भंडाफोड़ किया जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इस पूरे रैकेट का मुख्य आरोपी कूमर नारायण था, जो एक निजी इंडस्ट्री का दिल्ली क्षेत्र का रीजनल मैनेजर था और दिल्ली जिमखाना क्लब का एक रसूखदार सदस्य था। कूमर नारायण जिमखाना क्लब के इसी आलीशान और विशिष्ट माहौल का इस्तेमाल देश के शीर्ष नीति निर्माताओं, रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों और प्रधानमंत्री कार्यालय के निजी स्टाफ को फंसाने के लिए करता था। क्लब की कॉकटेल पार्टियों, महंगी शराब और पैसों के लालच में आकर कई बड़े अधिकारियों ने देश के राज बेच दिए थे। कूमर नारायण यहाँ से भारत के गोपनीय रक्षा सौदों, परमाणु कार्यक्रमों और रणनीतिक कैबिनेट फाइलों की कॉपियां हासिल करता था और उन्हें फ्रांस, पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया जैसे देशों के एजेंटों व दूतावासों को बेचता था, ताकि विदेशी कंपनियां भारत के बड़े रक्षा अनुबंध हासिल कर सकें।


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राजीव गांधी का गुस्सा और बुलडोजर चलाने की वो सुगबुगाहट

​जब इस कांड का पर्दाफाश हुआ, तो सोलह से अधिक बड़े नौकरशाह गिरफ्तार किए गए थे। प्रधानमंत्री राजीव गांधी के अत्यंत भरोसेमंद प्रधान सचिव पीसी अलेक्जेंडर को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देना पड़ा था, क्योंकि उनके अपने निजी स्टाफ के लोग इस जासूसी रिंग में शामिल पाए गए थे। भारत ने तत्कालीन फ्रांसीसी राजदूत तक को वापस भेज दिया था। ऐतिहासिक दस्तावेजों और संस्मरणों के अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा में इतनी बड़ी चूक और इसमें दिल्ली जिमखाना क्लब के इस्तेमाल की बात जानकर प्रधानमंत्री राजीव गांधी इस कदर नाराज हुए थे कि उन्होंने इस एलीट क्लब को हमेशा के लिए बंद करने और इस पर बुलडोजर चलवाने तक का मन बना लिया था। हालांकि, तत्कालीन लुटियंस दिल्ली के मजबूत प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव के कारण यह कड़ा फैसला टल गया था, लेकिन जिमखाना क्लब के रसूख पर यह सबसे गहरा दाग था जो इतिहास में दर्ज हो गया।

राजनीतिक नैरेटिव की जंग और विशेषाधिकार पर चोट

​अब जब सरकार ने इस क्लब को पूरी तरह खाली करने का आदेश दिया है, तो देश का राजनीतिक और सामाजिक माहौल फिर गर्मा गया है। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर देश में दो स्पष्ट और बेहद तीखे नैरेटिव चल रहे हैं। सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में एक तीखा कटाक्ष यह भी चलता है कि जिमखाना क्लब केवल खानदानी रईसों का है, इसलिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे जमीनी पृष्ठभूमि से आए नेता इसके सदस्य नहीं बन सकते। हालांकि तकनीकी रूप से यह बात गलत है, क्योंकि क्लब के नियमों के मुताबिक देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को पद पर रहते हुए स्वतः ही मानद सदस्यता दी जा सकती है। लेकिन व्यावहारिक सच यह है कि वर्तमान सरकार की राजनीति का एक बड़ा आधार इस दिल्ली के लुटियंस एलीट तंत्र पर हमला करना रहा है। प्रधानमंत्री खुद को कामदार और विपक्ष को नामदार कहते आए हैं। इसलिए, इस तरह के औपनिवेशिक क्लबों से दूरी बनाए रखना और इन पर कार्रवाई करना उनकी एंटी-एलीट राजनीतिक छवि को मजबूत करता है। दूसरी तरफ विपक्ष का आरोप है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी पारंपरिक कोटे से इस क्लब के पुराने सदस्य रहे हैं, इसलिए सरकार राजनीतिक द्वेष के तहत इस क्लब के वजूद को ही खत्म कर देना चाहती है।

कॉर्पोरेट साठगांठ के आरोप और जवाबदेही के गंभीर सवाल

​जहाँ एक तरफ सरकार इस क्लब को हटाकर खुद को आम जनता के साथ और एलीट कल्चर के खिलाफ दिखा रही है, वहीं आलोचक और विपक्ष सरकार पर क्रोनी कैपिटलिज्म का गंभीर आरोप लगाते हैं। आलोचकों का तर्क है कि आग वहीं लगती है जहाँ से धुआँ उठता है। सरकार पर अडानी, अंबानी और अन्य बड़े कॉर्पोरेट घरानों को आर्थिक फायदा पहुँचाने और राष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स सौंपने के आरोप लगातार लगते रहे हैं। इस नैरेटिव को बल इसलिए भी मिलता है क्योंकि प्रधानमंत्री ने अपने पूरे कार्यकाल में पारंपरिक तरीके से कोई खुली, बिना स्क्रिप्ट वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है, जहाँ पत्रकार सीधे इन कॉर्पोरेट संबंधों, आर्थिक नीतियों या जिमखाना क्लब जैसे संवेदनशील फैसलों पर तीखे सवाल पूछ सकें। आलोचकों के अनुसार, मीडिया के सामने सीधे न आना लोकतांत्रिक जवाबदेही से कतराने जैसा है।

कर्मचारियों पर मंडराता संकट और भविष्य की कानूनी लड़ाई

​सरकार के इस अचानक आए बेदखली आदेश से क्लब के भीतर काम करने वाले करीब छह सौ कर्मचारियों की नौकरियों और रोजी-रोटी पर गहरा संकट मंडराने लगा है। क्लब के स्थायी सदस्यों और खेल प्रेमियों का मानना है कि यह दिल्ली की एक ऐतिहासिक और खेल धरोहर, विशेषकर इसके प्रसिद्ध घास के टेनिस कोर्ट को खत्म करने जैसा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, क्लब प्रबंधन और इसके वीआईपी सदस्य सरकार के इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देने के लिए पूरी कानूनी तैयारी कर रहे हैं। बिना किसी लाग-लपेट के निष्पक्ष सच यही है कि दिल्ली जिमखाना क्लब का इतिहास जितना गौरवशाली रहा, उसका आंतरिक ढर्रा उतना ही अपारदर्शी, विवादित और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ था। 1985 के जासूसी कांड से लेकर 2022 के वित्तीय घोटाले तक, इस क्लब ने कई बार विवादों को जन्म दिया, जिसके चलते इस पर होने वाली कार्रवाई कानूनी रूप से तर्कसंगत दिखती है। लेकिन दूसरी तरफ, लुटियंस दिल्ली के इस प्रतीक को ढहाकर अपनी छवि चमकाने वाली सरकार पर बड़े पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाने और मीडिया के सवालों से बचने के जो आरोप लगते रहे हैं, वे भी उतने ही गंभीर और प्रासंगिक हैं। जून की पांच तारीख को इस क्लब की जमीन का नियंत्रण किसके हाथ जाता है, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।

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