गोरखपुर विश्वविद्यालय के माहौल में उस वक्त सियासी गर्माहट बढ़ गई, जब ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने यूनिवर्सिटी प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। कैंपस में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मंच से बोलते हुए उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि छात्रों के हक की बात दबाने की कोशिश की जा रही है, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
प्रशासन का फोन कॉल
नेहा बोरा ने मंच से अपनी बात रखते हुए बताया कि जब वह कार्यक्रम में शामिल होने के लिए निकल रही थीं, तो उससे ठीक पहले उनके पास विश्वविद्यालय प्रशासन का फोन आया था। उनसे कहा गया कि प्रशासन ने इस आयोजन के लिए सहयोग किया है, इसलिए वे भी सहयोग करें। इतना ही नहीं, उन्हें हिदायत भी दी गई कि वे मंच से ज्यादा राजनीतिक बातें न करें।
छात्रों की आवाज
प्रशासन की इस नसीहत पर तीखा जवाब देते हुए नेहा ने कहा कि उत्तर प्रदेश में छात्रों और नौजवानों के असली मुद्दों को उठाने के लिए ही पूरा कार्यक्रम तय किया गया था। जब इस पूरे अभियान का मकसद ही युवाओं की आवाज में अपनी आवाज मिलाना है, तो फिर राजनीति से दूरी कैसे बनाई जा सकती है? उन्होंने कहा कि गोरखपुर यूनिवर्सिटी में छात्रों के बीच आकर उनके मुद्दों पर बात न करना उनकी संगठन नीति का हिस्सा नहीं हो सकता।
कैंपस में चर्चा
नेहा बोरा के इस बयान के बाद से ही विश्वविद्यालय परिसर में छात्र राजनीति को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। आइसा के कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रशासन अपनी कमियों को छिपाने के लिए छात्रों और छात्र नेताओं की आवाज बंद कराने का प्रयास कर रहा है। वहीं, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर आम छात्रों के बीच भी प्रशासनिक रवैये पर सवाल उठने लगे हैं।
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