उत्तराखंड की कड़ाके की ठंड में गदरपुर की राजनीतिक फिजां इन दिनों असाधारण रूप से गर्म है। वसंत पंचमी के पावन अवसर पर गूलरभोज में आयोजित घी-खिचड़ी भोज महज एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि पूर्व कैबिनेट मंत्री और विधायक अरविंद पांडे का एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन माना जा रहा था। इस आयोजन की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि इसमें गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी, पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और मदन कौशिक जैसे कद्दावर चेहरों की मौजूदगी तय थी। प्रशासन ने बकायदा वीवीआईपी सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार कर लिया था, लेकिन ऐन वक्त पर इन दिग्गजों का कार्यक्रम रद्द होना प्रदेश की राजनीति में बड़े उलटफेर का संकेत दे गया। हालांकि अरविंद पांडे ने जनसभा में यह कहकर स्थिति संभालने की कोशिश की कि उन्होंने खुद फोन कर नेताओं को आने से मना किया, लेकिन सियासी गलियारों में यह बात किसी के गले नहीं उतरी। चर्चा आम है कि पार्टी हाईकमान के हस्तक्षेप या किसी बड़े रणनीतिक इशारे के बाद ही इन दिग्गज नेताओं ने गदरपुर से दूरी बनाई है।

प्रशासनिक शिकंजा और सीबीआई जांच की मांग का साइड इफेक्ट

अरविंद पांडे की मुश्किलें उस वक्त से बढ़नी शुरू हुईं जब उन्होंने काशीपुर के सुखवंत सिंह आत्महत्या मामले में अपनी ही सरकार के रुख से इतर सीबीआई जांच की पैरवी कर दी। इसके बाद से ही विधायक पांडे के खिलाफ प्रशासनिक मशीनरी काफी सक्रिय नजर आने लगी। देखते ही देखते उन पर जमीन से जुड़े पुराने प्रकरणों की फाइलें खुलने लगीं और उनके आवास पर अतिक्रमण हटाने का नोटिस तक चस्पा कर दिया गया। एक सिटिंग विधायक के खिलाफ इस तरह की प्रशासनिक सख्ती बिना किसी ऊंचे राजनैतिक संकेत के संभव नहीं मानी जाती। राजनीति के जानकार इसे पांडे की घेराबंदी के तौर पर देख रहे हैं। जब किशन सिंह चुफाल जैसे नेता उनके समर्थन में खड़े हुए, तब लगा था कि त्रिवेंद्र रावत और अनिल बलूनी की मौजूदगी उन्हें संजीवनी देगी, मगर गृहमंत्री अमित शाह के उत्तराखंड दौरे के बीच इन नेताओं का हाथ खींच लेना अरविंद पांडे के लिए खतरे की घंटी साबित हो रहा है।

मुख्यमंत्री का 'रुद्रपुर प्लान' और खिसकती राजनैतिक जमीन

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सबसे बड़ा और चौंकाने वाला पहलू 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात है। सत्ता के गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आगामी चुनाव में अपनी पारंपरिक सीट खटीमा के बजाय रुद्रपुर को अपना रणक्षेत्र बना सकते हैं। चर्चा ये भी है कि मुख्यमंत्री धामी ने अपने करीबियों को आने वाले चुनाव के लिए जमीन तैयार करने की जिम्मेदारी भी दे दी है। रुद्रपुर को भाजपा के लिए सबसे सुरक्षित किला माना जाता है और वर्तमान विधायक शिव अरोरा मुख्यमंत्री के बेहद करीबी हैं। पिछले कुछ समय से शिव अरोरा की गदरपुर क्षेत्र में बढ़ती सक्रियता और दखलअंदाजी ने अरविंद पांडे के खेमे में बेचैनी पैदा कर दी है। यदि मुख्यमंत्री रुद्रपुर से ताल ठोकते हैं, तो समीकरणों को संतुलित करने के लिए गदरपुर की सीट और वहां के नेतृत्व में बड़ा बदलाव अपरिहार्य हो जाएगा। यही नहीं, मुख्यमंत्री धामी के बेहद करीबी किच्छा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला ने तो सीधे-सीधे अरविन्द पांडे के खिलाफ पुरे उत्तराखंड में विरोध दर्ज कराने का बयान दे दिया है। पार्टी अब किसी भी तरह का जोखिम लेने के मूड में नहीं है, और शायद यही वजह है कि अरविंद पांडे खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं।

चौंकाने वाले फरमान की आहट और अस्तित्व की लड़ाई

वर्तमान परिस्थितियों को देखकर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अरविंद पांडे के लिए आने वाला समय अग्निपरीक्षा जैसा होने वाला है। एक तरफ उन पर जमीनी विवादों का बोझ है और दूसरी तरफ पार्टी के भीतर बढ़ता अविश्वास। जिस तरह से उनके खास कार्यक्रम से बड़े नेताओं ने दूरी बनाई, उससे साफ है कि आलाकमान फिलहाल पांडे के साथ खड़े होकर किसी विवाद को मोल लेना नहीं चाहता। रुद्रपुर और गदरपुर के बीच बुना जा रहा यह सियासी जाल अरविंद पांडे के राजनीतिक करियर को हाशिए पर धकेल सकता है। यदि पार्टी ने अनुशासन और नई रणनीति का हवाला देते हुए कोई कठोर निर्णय लिया, तो गदरपुर का यह विधायक एक बड़े राजनैतिक वनवास की ओर बढ़ सकता है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पांडे इस चक्रव्यूह को तोड़ पाएंगे या फिर 2027 की तैयारी में जुटी भाजपा उन्हें किनारे कर नया चेहरा सामने लाएगी।


Advertisement

---समाप्त---