अंकिता भंडारी हत्याकांड में न्याय और वीआईपी चेहरे के खुलासे की मांग को लेकर आज उत्तराखंड बंद का आह्वान किया गया था, लेकिन धरातल पर इसका असर उम्मीद के मुताबिक नहीं दिखा। राजधानी देहरादून से लेकर तराई के शहरों तक जनजीवन सामान्य नजर आया। अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष मोर्चा और विपक्षी दलों (कांग्रेस, यूकेडी, वामपंथी दल) ने पूरी ताकत झोंकने की कोशिश की थी, लेकिन व्यापारिक संगठनों के समर्थन न मिलने से बंद की मुहिम फीकी पड़ गई। हालांकि सड़कों पर प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर नारेबाजी करते जरूर दिखे, पर आम जनता और व्यापारियों ने खुद को इस बंद से काफी हद तक दूर रखा।
रुद्रपुर और ऊधमसिंह नगर में सामान्य स्थिति
कुमाऊं के औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र रुद्रपुर में बंद पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। यहां की पूरी मार्केट खुली रही और व्यापारिक गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़ा। रविवार की छुट्टी होने की वजह से बाजारों में सुबह से ही ग्राहकों की भारी भीड़ देखी गई और लोगों ने जमकर खरीदारी की। बीते दिन ही स्थानीय व्यापार मंडल ने एक वीडियो संदेश जारी कर बंद से खुद को अलग कर लिया था और आंदोलन वापस ले लिया था, जिसका असर आज साफ दिखाई दिया। जनपद के अन्य शहरों जैसे काशीपुर और किच्छा में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही रही, जहां दुकानें और व्यापारिक प्रतिष्ठान रोज की तरह खुले रहे।
प्रमुख शहरों का हाल और प्रशासन की मुस्तैदी
धर्मनगरी हरिद्वार में बंद का केवल आंशिक असर ही देखने को मिला, जहां कुछ इलाकों में समर्थकों ने दुकानें बंद कराने की कोशिश की लेकिन पुलिस की मौजूदगी ने इसे सफल नहीं होने दिया। राजधानी देहरादून के पलटन बाजार और राजपुर रोड जैसे व्यस्त इलाकों में भी रौनक बरकरार रही। पुलिस प्रशासन ने किसी भी संभावित उपद्रव को रोकने के लिए चप्पे-चप्पे पर भारी पुलिस बल की तैनाती की थी। गढ़वाल रेंज के आईजी खुद पल-पल की रिपोर्ट ले रहे हैं। हल्द्वानी और ऋषिकेश जैसे शहरों में भी सुबह के वक्त कुछ हलचल देखी गई, लेकिन दोपहर होते-होते वहां भी स्थिति पूरी तरह सामान्य हो गई और वाहनों की आवाजाही पर कोई रोक नहीं लगी।
सियासी बयानबाजी और अस्मिता का सवाल
भले ही बाजारों में बंद का असर न दिखा हो, लेकिन विपक्षी नेताओं ने इसे राज्य की अस्मिता का सवाल बताया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने जनता से अपील की थी कि वे बेटियों के सम्मान की इस लड़ाई में साथ आएं। महिला मंच की संयोजक कमला पंत और मूल निवास भू-कानून संघर्ष समिति के मोहित डिमरी ने स्पष्ट किया कि बंद का असर चाहे जो भी हो, लेकिन उनका आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज की निगरानी में सीबीआई जांच शुरू नहीं हो जाती। संगठनों का कहना है कि यह लड़ाई केवल एक दिन के बंद की नहीं, बल्कि उत्तराखंड की हर बेटी को सुरक्षित बनाने के लिए उस अज्ञात वीआईपी को बेनकाब करने की है।
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