सोशल मीडिया आज के दौर में जितना मददगार है, उतना ही भ्रामक भी साबित हो रहा है। हाल ही में फेसबुक पर वायरल हुए एक वीडियो ने उत्तराखंड पुलिस और प्रशासन के बीच हड़कंप मचा दिया था। खटीमा और बिलासपुर क्षेत्र के चार युवकों ने हाथ जोड़कर और रुआंसे होकर एसएसपी मणिकांत मिश्रा से मदद की अपील की थी। वीडियो में दावा किया गया था कि उन्हें दुबई में एजेंटों द्वारा धोखा दिया गया है, उनके पासपोर्ट छीन लिए गए हैं और उन्हें नारकीय परिस्थितियों में बंधक बनाकर रखा गया है। जैसे ही यह वीडियो वायरल हुआ, न केवल शासन-प्रशासन हरकत में आया बल्कि जनता के बीच भी एजेंटों और विदेशी नौकरियों को लेकर आक्रोश फैल गया। लेकिन जब ऊधमसिंह नगर पुलिस ने इस मामले की तह तक जाने के लिए जांच की कमान संभाली, तो जो सच सामने आया उसने सबको हैरान कर दिया। यह कोई अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी का मामला नहीं, बल्कि घर लौटने की बेताबी में रची गई एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा था।

मनगढ़ंत आरोपों की नींव पर खड़ी झूठी कहानी

जांच में यह तथ्य प्रकाश में आया कि खटीमा के चंदेली के लल्लन प्रसाद, भुड़िया निवासी जुगेश, रुस्तमपुर खजुरिया के विशाल शर्मा और वेदपुर ग्राम निवासी रंजीत सिंह समेत कुल आठ युवक दुबई गए थे। उन्हें वहां उसी काम पर लगाया गया था, जिसकी जानकारी उन्हें भारत में दी गई थी। इनमें से चार युवक तो शांति से अपना काम कर रहे थे, लेकिन बाकी चार का वहां की परिस्थितियों और काम में मन नहीं लगा। विदेशी धरती पर काम का दबाव और घर की याद ने उन्हें इस कदर बेचैन किया कि उन्होंने कानून का सहारा लेने के बजाय कानून को ही गुमराह करने का रास्ता चुना। उन्होंने वीडियो में एजेंटों पर पासपोर्ट जब्त करने और धमकियां देने के जो आरोप लगाए थे, वे पूरी तरह निराधार निकले। पुलिस ने जब उन एजेंटों और वहां मौजूद अन्य युवकों से संपर्क किया, तो पता चला कि पासपोर्ट उनके पास सुरक्षित थे और उन्हें किसी भी तरह प्रताड़ित नहीं किया जा रहा था।

सिस्टम को गुमराह करने की खतरनाक प्रवृत्ति

एसएसपी मणिकांत मिश्रा ने स्पष्ट किया कि युवाओं द्वारा रची गई यह कहानी पूरी तरह से मनगढ़ंत थी। दुबई का माहौल रास न आने पर उन्होंने खुद को संकट में दिखाने का नाटक किया, ताकि पुलिस के हस्तक्षेप से उनका भारत लौटना आसान हो जाए। पुलिस के अनुसार, ये चारों युवक वर्तमान में अपने एक परिचित के घर पर सुरक्षित हैं। यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि कैसे अपनी निजी सहूलियत के लिए लोग सुरक्षा एजेंसियों और सोशल मीडिया की ताकत का दुरुपयोग करते हैं। इस तरह की झूठी सूचनाओं से न केवल पुलिस का कीमती समय बर्बाद होता है, बल्कि उन वास्तविक पीड़ितों के लिए भी मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं जिन्हें वाकई में मदद की जरूरत होती है।

संवेदनशीलता का दुरुपयोग और पुलिस की चेतावनी

पुलिस जांच में यह भी साफ हो गया है कि एजेंटों ने किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं किया था। युवाओं को जिस काम का वादा किया गया था, उन्हें वही काम दिया गया। इस पूरे प्रकरण ने सुरक्षा एजेंसियों को भी सतर्क कर दिया है। सोशल मीडिया पर बिना जांच-पड़ताल के किसी भी वीडियो को सच मान लेना कितना घातक हो सकता है, यह घटना उसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पुलिस ने चेतावनी दी है कि सिस्टम को इस तरह से गुमराह करना भविष्य में उनके लिए कानूनी मुश्किलें खड़ी कर सकता है। फिलहाल, युवकों से संपर्क बना हुआ है और वे जल्द ही भारत लौट सकते हैं, लेकिन उनके पीछे वे एक ऐसा सवाल छोड़ गए हैं कि क्या घर वापसी के लिए इस तरह का झूठ बोलना नैतिक रूप से सही है?


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