उत्तराखंड के प्रख्यात पर्यावरणविद और हेस्को के संस्थापक डॉ. अनिल प्रकाश जोशी इन दिनों विवादों के केंद्र में हैं। उन पर आरक्षित वन भूमि पर अवैध तरीके से कब्जा करने का संगीन आरोप लगा है। कांग्रेस नेता और अधिवक्ता संदीप मोहन चमोली ने इस संबंध में औपचारिक शिकायत दर्ज कराते हुए सनसनी फैला दी है। चमोली का दावा है कि डॉ. जोशी ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर सरकारी वन संपदा को नुकसान पहुँचाया है। यह मामला ऐसे समय में गरमाया है जब उत्तराखंड में वन भूमि से अवैध कब्जे हटाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले से ही सख्त रुख अपनाए हुए है।

सैटेलाइट तस्वीरों ने बढ़ाईं डॉ. जोशी की मुश्किलें

​शिकायतकर्ता संदीप चमोली ने अपने आरोपों को पुख्ता करने के लिए तकनीकी साक्ष्यों का सहारा लिया है। उन्होंने इसरो भवन और गूगल अर्थ की सैटेलाइट इमेजरी का हवाला देते हुए यह तर्क दिया है कि आरक्षित वन क्षेत्र में डॉ. जोशी द्वारा अवैध निर्माण और कब्जा किया गया है। इन डिजिटल सबूतों ने वन विभाग और प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। यदि ये आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह न केवल एक व्यक्ति की साख पर सवाल होगा, बल्कि उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर चल रहे संस्थानों की कार्यप्रणाली को भी कटघरे में खड़ा कर देगा।

अंकित भंडारी केस और 'वीआईपी' कनेक्शन का पेच


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​इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक गहरा राजनीतिक और सामाजिक कोण भी जुड़ा नजर आ रहा है। दरअसल, यह शिकायत डॉ. अनिल जोशी द्वारा अंकित भंडारी हत्याकांड में एक अज्ञात वीआईपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के ठीक बाद आई है। जनवरी 2026 में देहरादून के बसंत विहार थाने में दर्ज उस मामले के बाद से ही जोशी निशाने पर थे। संदीप चमोली और कुछ अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि डॉ. जोशी की वह सक्रियता किसी बड़े चेहरे को बचाने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकती है। इसी विरोधाभास ने अब वन भूमि अतिक्रमण के मामले को और अधिक 'हार्ड-हिटिंग' बना दिया है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और प्रशासनिक चुप्पी

​उत्तराखंड में वन भूमि अतिक्रमण एक ऐसा नासूर बन चुका है जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिए थे कि किसी भी कीमत पर वन भूमि को अतिक्रमण मुक्त किया जाए। ऐसे में एक उच्च सम्मानित व्यक्ति पर लगे इन आरोपों ने प्रशासन को धर्मसंकट में डाल दिया है। हालांकि अब तक पुलिस या वन विभाग की ओर से डॉ. जोशी के खिलाफ किसी बड़ी आधिकारिक कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस शिकायत ने राज्य के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

 

(नोट-यह खबर उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों और सोशल मीडिया चर्चाओं पर आधारित है)

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