बिहार में एक समय वह था जब जंगलराज का नाम लेकर लालू यादव की सत्ता को घेरा गया था और सूबे में कानून का राज स्थापित करने के संकल्प के साथ मौजूदा सरकार ने बागडोर संभाली थी। लेकिन वैशाली जिले के सोनपुर से सामने आई रूह कंपा देने वाली वारदात ने उन तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी है। पहलेजा थाना क्षेत्र में एक छात्रा के साथ जो हुआ, उसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या बिहार वास्तव में उस काले दौर से बाहर निकल पाया है? जब सरेआम घर के दरवाजे से बेटियों का अपहरण होने लगे, तो सरकार की इकबाल पर सवाल उठना लाजिमी है। यह घटना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि उस सुशासन के चेहरे पर भी एक गहरा जख्म है जो हर मंच से अपनी पीठ थपथपाता नजर आता है।
सुरक्षा का खोखला ढांचा और हैवानियत का तांडव
मंगलवार की शाम जब पूरा गांव अपनी दिनचर्या में मशगूल था, तभी दो नाबालिग आटो चालकों ने कानून को ठेंगे पर रखकर एक छात्रा की गरिमा को तार-तार कर दिया। गंगा नदी के उस पार स्थित गांव की इस छात्रा को जबरन उठा ले जाना और गांव के बाहर ले जाकर उसके साथ दरिंदगी करना बताता है कि अपराधियों के मन में पुलिस का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है। जिस जंगलराज का डर दिखाकर सत्ता की कुर्सी हासिल की गई, आज उसी तरह की अराजकता सड़कों पर तांडव कर रही है। घर से चंद कदम की दूरी पर सुरक्षित न होना इस बात का प्रमाण है कि कानून का राज केवल फाइलों और भाषणों तक ही सीमित रह गया है, जबकि धरातल पर बेटियां आज भी उसी खौफ के साये में जीने को मजबूर हैं।
पुलिसिया कार्रवाई और व्यवस्था की विफलता
घटना के बाद पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए दोनों नाबालिग आरोपियों को गिरफ्तार कर रिमांड होम तो भेज दिया है, लेकिन यह कार्रवाई उस गहरे जख्म की भरपाई नहीं कर सकती जो इस व्यवस्था ने छात्रा और उसके परिवार को दिया है। पहलेजा थानाध्यक्ष अनुराधा कुमारी ने बताया कि मामले में प्राथमिकी दर्ज कर कानूनी प्रक्रिया पूरी की जा रही है। सवाल यह उठता है कि क्या केवल गिरफ्तारी ही समाधान है? जब व्यवस्था में अपराधियों को यह लगने लगे कि वे कुछ भी करके बच सकते हैं, तभी ऐसी हिम्मत पनपती है। यह वही स्थिति है जिसे कभी 'जंगलराज' की संज्ञा दी गई थी, और आज वही मंजर दोबारा दोहराया जा रहा है, जिससे आम जनता के बीच सरकार के प्रति अविश्वास की भावना पैदा हो रही है।
सत्ता के संकल्प और हकीकत के बीच की खाई
मौजूदा सरकार अक्सर यह दोहराती है कि बिहार में अब कानून का राज है और अपराधी पाताल में भी होंगे तो खोज निकाले जाएंगे। लेकिन सोनपुर की इस वारदात ने यह साबित कर दिया है कि अपराधियों को पाताल में खोजने की जरूरत नहीं, वे सड़कों पर आटो चलाते हुए खुलेआम शिकार तलाश रहे हैं। जिस राजनीतिक विमर्श के आधार पर लालू यादव के शासनकाल को कोसा गया, आज वही स्थितियां सुशासन के दावों को चुनौती दे रही हैं। यदि सरकार वास्तव में बेटियों की सुरक्षा के प्रति गंभीर है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि अपराधी चाहे कोई भी हो, न्याय इतना त्वरित और कठोर हो कि दोबारा ऐसी हिमाकत करने की कोई सोच भी न सके। अन्यथा, सुशासन और जंगलराज के बीच का अंतर केवल कागजी बनकर रह जाएगा।
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