जम्मू-कश्मीर में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में एक नई उम्मीद बनकर उभरा श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस अब विवादों और विफलता के केंद्र में है। नेशनल मेडिकल काउंसिल यानी एनएमसी ने संस्थान की कमियों पर कड़ा प्रहार करते हुए शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए एमबीबीएस कोर्स की अनुमति वापस ले ली है। यह फैसला महज एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि उन 50 छात्रों के भविष्य पर लगा एक बड़ा प्रश्नचिह्न है जिन्होंने कड़ी मेहनत से नीट की परीक्षा उत्तीर्ण कर यहां दाखिला लिया था। विडंबना यह है कि जिस संस्थान को स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांति लाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था, वह स्वयं बीमार हालत में पाया गया। एनएमसी के इस कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि देश में चिकित्सा शिक्षा के मानकों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा, चाहे संस्थान का नाम कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो।

निरीक्षण में खुली दावों की पोल

पिछले सप्ताह जब एनएमसी की टीम ने संस्थान का औचक निरीक्षण किया, तो वहां की जमीनी हकीकत कागजी दावों से कोसों दूर मिली। अधिकारियों ने पाया कि कॉलेज में न तो पर्याप्त संख्या में अनुभवी फैकल्टी मौजूद है और न ही छात्रों को प्रशिक्षित करने के लिए जरूरी क्लीनिकल सुविधाएं उपलब्ध हैं। एक मेडिकल कॉलेज के लिए अस्पताल और वहां आने वाले मरीजों की संख्या उसकी रीढ़ होती है, लेकिन इस संस्थान में इन मूलभूत आवश्यकताओं का भारी अभाव दिखा। लगातार मिल रही शिकायतों के बाद किए गए इस औचक निरीक्षण ने यह साबित कर दिया कि संस्थान केवल नाम के सहारे चल रहा था। बुनियादी ढांचे की इन गंभीर कमियों ने छात्रों के प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर गंभीर खतरा पैदा कर दिया था, जिसके परिणामस्वरुप एनएमसी को यह कठोर निर्णय लेना पड़ा।

छात्रों का भविष्य और सामाजिक समीकरण

इस संस्थान को इसी साल सितंबर में 50 सीटों के साथ एमबीबीएस शुरू करने की अनुमति मिली थी। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन 50 छात्रों में से 44 छात्र मुस्लिम समुदाय से थे, जिन्होंने अपनी प्रतिभा और मेरिट के दम पर जगह बनाई थी। इन छात्रों और उनके परिवारों के लिए यह खबर किसी बड़े झटके से कम नहीं है। चिकित्सा जैसे संवेदनशील पेशे में प्रवेश पाने की खुशी अब अनिश्चितता के डर में बदल चुकी है। प्रशासन की लापरवाही का खामियाजा उन युवाओं को भुगतना पड़ रहा है जो जम्मू-कश्मीर के दुर्गम इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने का सपना देख रहे थे। अब सवाल यह उठता है कि इन छात्रों के शैक्षणिक वर्ष को बचाने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे और क्या उन्हें किसी अन्य मान्यता प्राप्त कॉलेज में स्थानांतरित किया जाएगा।

सिस्टम की सर्जरी और बेनकाब प्रबंधन

यह घटना पूरे देश के मेडिकल कॉलेजों के लिए एक चेतावनी की तरह है। केवल इमारतें खड़ी कर देने से कोई संस्थान मेडिकल कॉलेज नहीं बन जाता, उसके लिए योग्य शिक्षक और आधुनिक लैब के साथ-साथ एक सुदृढ़ स्वास्थ्य प्रणाली की आवश्यकता होती है। श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस में संसाधनों की कमी यह दर्शाती है कि कहीं न कहीं अनुमति देने की प्रारंभिक प्रक्रिया में भी चूक हुई थी। एनएमसी का यह हंटर भ्रष्टाचार और लापरवाही के खिलाफ एक कड़ा संदेश है। यदि संस्थानों में फैकल्टी केवल कागजों पर होगी और छात्र बिना प्रैक्टिकल ज्ञान के डॉक्टर बनेंगे, तो यह समाज के स्वास्थ्य के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ होगा। अब समय आ गया है कि ऐसी चूक करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों और संस्थान के प्रबंधन पर सख्त कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में किसी अन्य छात्र का करियर दांव पर न लगे।


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