ग्वालियर के आदर्शपुरम में रहने वाले वकील मृत्युंजय सिंह चौहान के लिए 12 दिसंबर की रात काल बनकर आई। पिछले पांच वर्षों से जिस महिला सब-इंस्पेक्टर प्रीति जादौन के साथ वह जीवन बिताने के सपने देख रहे थे, उसकी असलियत ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। मृत्युंजय अपनी होने वाली पत्नी को सरप्राइज देने मुरैना स्थित उनके शासकीय आवास पहुंचे थे, लेकिन वहां का नजारा देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने प्रीति को आरक्षक अराफात खान के साथ आपत्तिजनक स्थिति में पाया। जब एक प्रेमी और मंगेतर के नाते उन्होंने इस पर आपत्ति जताई, तो न्याय मिलने के बजाय उन्हें प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। आरोप है कि महिला एसआई और आरक्षक ने मिलकर उनके साथ मारपीट की और उन्हें मानसिक रूप से इस कदर प्रताड़ित किया कि उनके पास मौत को गले लगाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।
न्याय की गुहार और तंत्र की संवेदनहीनता
घटना के बाद मृत्युंजय ने एक जिम्मेदार नागरिक की तरह कानून का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने मुरैना के सिविल लाइन थाने और सिटी कोतवाली में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन वर्दी के रसूख के आगे उनकी आवाज दबा दी गई। विडंबना यह रही कि पीड़ित वकील पर ही उल्टा मामला दर्ज कर लिया गया। अपनी बेगुनाही और धोखे की दास्तां सुनाने के लिए मृत्युंजय ने पुलिस के आला अधिकारियों, जिनमें एसपी, एएसपी और सीएसपी शामिल थे, उन्हें सोशल मीडिया के जरिए संदेश भेजे। महिला एसआई के फोन से ही उन्होंने सिस्टम को जगाने की कोशिश की, लेकिन सत्ता और पद के मद में चूर विभाग ने अपने ही साथी का बचाव किया। यह पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान है कि कैसे एक कानून के जानकार को ही सिस्टम ने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
सोशल मीडिया पर आखिरी पैगाम और रोंगटे खड़े करने वाला अंत
14 और 15 दिसंबर की दरम्यानी रात मृत्युंजय ने फांसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। मरने से पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर जो स्टेटस लगाया, वह आज समाज की खोखली संवेदनाओं को दर्शाता है। उन्होंने लिखा था कि प्रेम में मृत्यु है लेकिन मुक्ति नहीं। इस दर्दनाक संदेश पर उनकी मंगेतर प्रीति जादौन ने 'ब्लेस' कमेंट किया, जो उनकी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा थी। कमरे से बरामद हुआ सिविल लाइन थाने के नाम लिखा आवेदन आज एक सुसाइड नोट बन चुका है, जिसने उन तमाम साजिशों की परतें खोल दी हैं जो मृत्युंजय की मौत का कारण बनीं। 30 दिसंबर को जिस घर में शहनाइयां बजनी थीं, वहां अब मातम और इंसाफ की चीखें हैं। अब जाकर ग्वालियर पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया है, लेकिन सवाल वही है कि क्या मृत्युंजय को जीते जी न्याय नहीं मिल सकता था?
---समाप्त---