महाराष्ट्र के पुणे स्थित एआईसीसीएमएस कॉलेज मैदान में आयोजित 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में पुरुषों द्वारा महिलाओं को केवल तीन दायरों—बेटी, पत्नी या मां—तक सीमित कर दिया जाता है। राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि इन पारिवारिक रिश्तों का सम्मान करना गलत नहीं है, लेकिन किसी महिला की एकमात्र पहचान केवल पुरुषों से जुड़े इन संबंधों के आधार पर तय नहीं की जा सकती। आज की महिलाएं पेशेवर, खिलाड़ी, उद्यमी, नेता और सर्जक के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान बना रही हैं।

​राहुल गांधी ने भाषण के दौरान मनुस्मृति के श्लोक का उल्लेख करते हुए दावा किया कि इसमें स्पष्ट लिखा है कि एक महिला को बचपन में अपने पिता, युवावस्था में पति और पति के न रहने पर अपने बेटों के अधीन रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह विचार कि महिला कभी स्वतंत्र नहीं हो सकती, अत्यंत शर्मनाक है और ऐसे विचार कभी व्यक्त ही नहीं किए जाने चाहिए थे। राहुल गांधी के इस बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी ने पलटवार करते हुए उन पर सनातन संस्कृति और प्राचीन भारतीय ग्रंथों को समझे बिना राजनीति करने का आरोप लगाया। इसके बाद से ही देश में मनुस्मृति और महिलाओं के अधिकारों पर बहस फिर गर्म हो गई है।

मनुस्मृति में महिलाओं को लेकर क्या लिखा है?

​मनुस्मृति के पांचवें अध्याय के 148वें श्लोक में महिलाओं के संरक्षण और उनकी स्वतंत्रता की सीमाओं पर विस्तार से चर्चा की गई है। इस श्लोक के अनुसार, एक स्त्री को बाल्यावस्था में पिता के संरक्षण में, विवाह के बाद पति के अधीन और पति की मृत्यु के उपरांत अपने पुत्रों की देखरेख में रहना चाहिए। इसमें आगे यह भी कहा गया है कि किसी भी परिस्थिति में स्त्री को पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं छोड़ा जाना चाहिए।


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​इतिहासकारों और विश्लेषकों का मानना है कि मनुस्मृति का ढांचा पितृसत्तात्मक व्यवस्था को मज़बूत करता है। पंजाब यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के पूर्व प्रोफेसरों और अन्य शोधकर्ताओं के अनुसार, इस ग्रंथ में महिलाओं के कल्याण को पुरुषों के कल्याण से जोड़कर देखा गया है। इसमें महिलाओं को स्वतंत्र धार्मिक अनुष्ठान करने का अधिकार नहीं दिया गया, बल्कि पति की सेवा को ही उनके लिए स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग बताया गया है। इसके अलावा, समाज में उनकी भूमिका को मुख्य रूप से गृहस्थी की मर्यादा बनाए रखने तक सीमित रखा गया है।

मनुस्मृति की संरचना और ऐतिहासिक संदर्भ

​ऐतिहासिक दृष्टि से मनुस्मृति को प्राचीन भारत का एक धर्मशास्त्र या कानून संहिता माना जाता है, जिसकी रचना ईसा पूर्व दो से तीन सौ साल पहले शुरू हुई थी। इस ग्रंथ में कुल 12 अध्याय हैं और अलग-अलग संस्करणों के आधार पर इसमें 2684 से लेकर 2964 श्लोक मिलते हैं। इसके विभिन्न अध्यायों में प्रकृति के निर्माण, ब्रह्मचर्य, विवाह के प्रकार, गृहस्थ धर्म, राजा के कर्तव्य, अपराध एवं न्याय व्यवस्था, और संपत्ति के बटवारे जैसे विषयों का विस्तृत उल्लेख किया गया है।

​भारतीय इतिहास में मनुस्मृति के सिद्धांतों का विरोध बहुत पुराना रहा है। 25 दिसंबर 1927 को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने महाराष्ट्र के महाद में सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति का दहन किया था। आंबेडकर ने अपनी पुस्तक 'फिलॉसफी ऑफ हिंदूइज्म' में लिखा था कि मनुस्मृति ने वर्ण व्यवस्था और सामाजिक विषमता के बीज बोए, जिससे समाज का एक बड़ा वर्ग और महिलाएं अधिकारों से वंचित रह गईं। राहुल गांधी के पुणे संबोधन ने एक बार फिर इस ऐतिहासिक बहस को ताज़ा कर दिया है।

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