भारत में डिजिटल क्रांति का मुख्य आधार बन चुके UPI यानी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस की मुफ्त सेवा को लेकर एक नया कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। केंद्र सरकार ने संसद में 'पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट' में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। इस बदलाव का उद्देश्य भविष्य में कुछ विशेष UPI लेन-देन पर 'मर्चेंट डिस्काउंट रेट' यानी MDR लगाने के लिए एक ढांचा तैयार करना है। यद्यपि सरकार ने अभी किसी भी तरह की फीस को तुरंत लागू करने की मंजूरी नहीं दी है, लेकिन इस नए प्रावधान ने डिजिटल पेमेंट इंडस्ट्री तथा आम जनता के बीच एक व्यापक चर्चा को जन्म दे दिया है।

कानूनी बदलाव, फीस का संभावित गणित

​वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किया गया यह संशोधन फिलहाल केवल एक कानूनी आधार तैयार करता है, जिससे सरकार आवश्यकता पड़ने पर भविष्य में फीस संबंधी निर्णय ले सके। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेन-देन पर 0.3 प्रतिशत से 0.5 प्रतिशत तक का शुल्क लगाने के विचार पर मंथन चल रहा है। इस व्यवस्था की सबसे खास बात यह है कि यह शुल्क केवल उन बड़े व्यापारियों पर लागू करने की योजना है, जिनका सालाना कारोबार 1.5 करोड़ रुपये से अधिक है। इस व्यवस्था से आम ग्राहकों की जेब पर सीधा असर पड़ने की संभावना बेहद कम है तथा छोटे किराना स्टोर एवं स्थानीय व्यापारी भी इस दायरे से बाहर रहेंगे। वित्तीय विश्लेषण संस्था जेफरीज के अनुसार, 2,000 रुपये से अधिक के लेन-देन कुल मर्चेंट यूपीआई वॉल्यूम का केवल 4 प्रतिशत हैं, लेकिन कुल मूल्य में इनकी हिस्सेदारी लगभग 67 प्रतिशत है।

पेमेंट इंडस्ट्री का रुख, व्यावसायिक जरूरतें


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​पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स तथा वित्तीय संस्थाएं लंबे समय से यूपीआई लेन-देन पर सीमित मर्चेंट चार्ज की मांग कर रही हैं। वर्तमान में क्रेडिट कार्ड पर व्यापारी लगभग 1.5 प्रतिशत तथा डेबिट कार्ड पर भी एक तय प्रोसेसिंग फीस देते हैं, जबकि यूपीआई पूरी तरह से शुल्क-मुक्त रहा है। पेमेंट इंडस्ट्री के अधिकारियों का मानना है कि बिना किसी आय के लगातार सेवाएं देना, सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना तथा नई तकनीक में निवेश करना बेहद कठिन हो रहा है। अगर बड़े लेन-देन पर सीमित MDR लागू किया जाता है, तो इससे डिजिटल पेमेंट सेक्टर को सालाना 5,000 करोड़ रुपये से 10,000 करोड़ रुपये तक का राजस्व मिल सकता है, जिससे इस तंत्र को आत्मनिर्भर बनाया जा सके।

जनता की चिंताएं, जन-आकांक्षाएं

​इस संभावित बदलाव को लेकर आम जनता में चिंता का माहौल बनना स्वाभाविक है। आज के समय में जब आम नागरिक पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा है, तब किसी भी नई फीस या अप्रत्यक्ष वित्तीय बोझ की खबर से निराशा पैदा होती है। लोगों का मानना है कि सरकार का प्राथमिक कर्तव्य आम नागरिकों के दैनिक जीवन को सुलभ बनाना होना चाहिए, न कि उन पर लगातार नए नियम या वित्तीय सीमाएं थोपना। हालांकि सरकार की तरफ से यह स्पष्ट किया गया है कि अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है तथा जब तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं होती, तब तक सभी यूपीआई भुगतान पूर्ववत निशुल्क बने रहेंगे।

उपभोक्ता दृष्टिकोण, अप्रत्यक्ष वित्तीय दबाव

​भले ही इस व्यवस्था में आम ग्राहकों पर कोई प्रत्यक्ष शुल्क न लगाने की बात कही गई है, लेकिन आर्थिक धरातल पर इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। जब बड़े व्यापारी या रिटेलर्स अपनी बिक्री पर मर्चेंट चार्ज चुकाएंगे, तो वे इस अतिरिक्त लागत की भरपाई अंततः वस्तुओं व सेवाओं के अंतिम मूल्य में वृद्धि करके कर सकते हैं। महंगाई के मौजूदा दौर में नागरिक पहले से ही विविध वित्तीय दबावों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार का नया शुल्क, चाहे वह अप्रत्यक्ष ही क्यों न हो, आम जनता की क्रय शक्ति और डिजिटल माध्यमों पर उनके विश्वास को प्रभावित कर सकता है।

सुलगता सवाल

​एक तरफ जहां देश की डिजिटल फिनटेक इंडस्ट्री को मजबूत करने के लिए नए राजस्व मॉडल की तलाश की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ आम नागरिक यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि उनके रोजमर्रा के वित्तीय साधनों को जटिल एवं महंगा न बनाया जाए। अब देखना यह होगा कि सरकार वित्तीय कंपनियों के विकास तथा आम जनता के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाती है।

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