• सुप्रीम कोर्ट का फैसला कल यानि 02 दिसंबर को
  • रेलवे के दावे और विस्थापन की आशंका में 4,365 घर

हल्द्वानी/नैनीताल,(उत्तराखण्ड तहलका):​ नैनीताल के बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे भूमि अतिक्रमण का मामला इन दिनों उत्तराखंड की सबसे बड़ी कानूनी और मानवीय चुनौती बना हुआ है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय 02 दिसंबर 2025 को आना है, जिससे पूर्व प्रशासन हाई अलर्ट पर है। लेकिन यह विवाद है क्या, और क्यों यह मामला इतना संवेदनशील बन गया है कि 50 हजार से अधिक लोगों का भविष्य दांव पर लगा है?

विवाद का केंद्र: 30 एकड़ भूमि पर रेलवे का दावा

​बनभूलपुरा विवाद का मूल हल्द्वानी रेलवे स्टेशन से सटी लगभग 30 एकड़ भूमि पर है, जिस पर रेलवे अपना मालिकाना हक जताता है। यह दावा 1959 के शासकीय अधिसूचनाओं और 1971 के राजस्व रिकॉर्ड पर आधारित है।

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​मामले ने तब तूल पकड़ा जब 2013 में गौला नदी में अवैध खनन पर दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान रेलवे ने यह दावा प्रस्तुत किया। रेलवे का तर्क है कि उसे ट्रैक विस्तार और सुरक्षित रेल परिचालन के लिए यह भूमि खाली करानी आवश्यक है।


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हाईकोर्ट का आदेश और सुप्रीम कोर्ट की रोक

​इस मामले में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने रेलवे के दावों को स्वीकार करते हुए दिसंबर 2022 में इस क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था। इस आदेश के बाद स्थानीय निवासियों ने तीव्र विरोध प्रदर्शन किए, जिसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा।

​जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के ध्वस्तीकरण के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की थी कि 50,000 लोगों को रातोंरात नहीं हटाया जा सकता, और यह केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय संकट का मुद्दा है।

फैसला खिलाफ आया तो कितने घर होंगे प्रभावित?

​यह विवाद मुख्य रूप से उन हजारों परिवारों के अस्तित्व से जुड़ा है जो 60 वर्षों से भी अधिक समय से इस जमीन पर रह रहे हैं। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार:

  • ​यदि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला बनभूलपुरा निवासियों के खिलाफ आता है, तो लगभग 4,365 घर (परिवार) विस्थापन की जद में आ जाएंगे।
  • ​इन घरों में रहने वाली आबादी 50,000 से अधिक है, जिनमें बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं शामिल हैं।

​यह भी पढ़ें: banbhulpura Railway अतिक्रमण: न्याय के सम्मान के लिए प्रशासन की अभूतपूर्व तैयारी

सुप्रीम कोर्ट ने माँगा 'व्यावहारिक समाधान'

​सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अब तक पुनर्वास पर जोर दिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार, केंद्र सरकार और रेलवे को मिलकर इन परिवारों के लिए एक न्यायसंगत और व्यावहारिक पुनर्वास योजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं।

​02 दिसंबर 2025 का फैसला यह तय करेगा कि क्या इन दशकों पुराने मकानों को खाली करना होगा, और क्या राज्य सरकार के पास इतने बड़े पैमाने पर विस्थापित होने वाले लोगों के लिए कोई ठोस योजना तैयार है। प्रशासनिक अधिकारियों की सख्ती और जनता की निगाहें अब पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं।

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