पंजाब के गौरवशाली इतिहास में नाभा रियासत का एक विशेष स्थान रहा है। सोमवार को पटियाला जिले के नाभा स्थित हीरा महल में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने 124 वर्षों के लंबे इंतजार को समाप्त कर दिया। महाराजा रिपुदमन सिंह के प्रपौत्र कुंवर अभि उदय प्रताप सिंह की शाही दस्तारबंदी की रस्म पूरी धार्मिक मर्यादा और राजसी वैभव के साथ संपन्न हुई। यह केवल एक परिवार का निजी आयोजन नहीं था, बल्कि उन महान सिख परंपराओं का पुनरुद्धार था जो दशकों पहले रियासत के अभिन्न अंग हुआ करती थीं। इस अवसर पर मौजूद संगत और गणमान्य हस्तियों ने उस दौर को याद किया जब नाभा की धरती देशभक्ति और धार्मिक अडिगता का केंद्र हुआ करती थी।
महाराजा रिपुदमन सिंह: एक बागी राजा का त्याग
इस ऐतिहासिक आयोजन के बीच महाराजा रिपुदमन सिंह के अदम्य साहस की गाथाएं भी चर्चा का विषय रहीं। वे उस दौर के अन्य राजाओं से बिल्कुल भिन्न थे, जिन्होंने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने के बजाय राष्ट्रवाद का मार्ग चुना। साल 1911 में अपने राज्याभिषेक के दौरान उन्होंने ब्रिटिश रीति-रिवाजों को मानने से स्पष्ट इंकार कर दिया था। वे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और अकाली लहर के कट्टर समर्थक थे। उनकी इसी देशभक्ति से घबराकर अंग्रेजों ने एक षड्यंत्र रचा और नाभा-पटियाला विवाद की आड़ लेकर 9 जुलाई 1923 को उन्हें गद्दी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। उन्हें पहले देहरादून और बाद में तमिलनाडु के कोडईकनाल में नजरबंद रखा गया, जहाँ 1942 में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी गिरफ्तारी के विरोध में निकला 'जैतो का मोर्चा' इतिहास का वह पन्ना है जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी शिरकत की थी।
धार्मिक अनुष्ठान और मर्यादा का पालन
दस्तारबंदी की इस रस्म को बेहद कठिन और श्रद्धापूर्ण तरीके से संपन्न किया गया। कुंवर अभि उदय प्रताप सिंह ने दस्तारबंदी से पूर्व गुरुद्वारा दरबार सिरोपाओ साहिब में लगातार 48 घंटे तक एक ही चौंकड़े में बैठकर श्री गुरु ग्रंथ साहिब का अखंड पाठ श्रवण किया। यह एक अत्यंत कठिन साधना मानी जाती है, जिसे 124 साल पहले भाई नारायण सिंह ने इसी स्थान पर निभाया था। पाठ की समाप्ति के उपरांत गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब के हेड ग्रंथी भाई हरपाल सिंह ने अरदास की और कुंवर की दस्तारबंदी संपन्न हुई। इस दौरान कुंवर भावुक नजर आए और उन्होंने अपने परदादा महाराजा रिपुदमन सिंह के पदचिन्हों पर चलते हुए समाज और धर्म की सेवा करने का संकल्प दोहराया।
प्रतिष्ठित हस्तियों ने दी समारोह में हाजिरी
इस गरिमामयी समारोह के साक्षी बनने के लिए कई बड़ी हस्तियां नाभा पहुंचीं। डेरा ब्यास प्रमुख संत गुरिंदर सिंह ढिल्लों की उपस्थिति ने कार्यक्रम की आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ा दिया। इसके साथ ही पंजाब विधानसभा के स्पीकर कुलतार सिंह संधवां, कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां और पर्यटन मंत्री तरुणप्रीत सिंह सौंद विशेष रूप से शामिल हुए। एसजीपीसी प्रधान हरजिंदर सिंह धामी और पद्मश्री जगजीत सिंह दर्दी सहित कई विद्वानों ने कुंवर को शुभकामनाएं दीं। पर्यटन मंत्री ने इस बात की सराहना की कि किस प्रकार रानी प्रीति सिंह और दीवान टोडर मल हेरिटेज फाउंडेशन अपनी विरासत को सहेजने का कार्य कर रहे हैं। मंत्रियों ने कहा कि महाराजा रिपुदमन सिंह के वंशजों से समाज को बड़ी उम्मीदें हैं।
नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का संकल्प
कार्यक्रम के अंत में कुंवर अभि उदय प्रताप सिंह के माता-पिता, भानु प्रताप सिंह और रानी प्रीति सिंह नाभा ने संगत का आभार व्यक्त किया। कुंवर ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि आज के दौर में यह अत्यंत आवश्यक है कि हर सिख परिवार अपने बच्चों की दस्तारबंदी करे। उनका मानना है कि इस तरह के संस्कार ही नई पीढ़ी को उनके गौरवशाली और संघर्षशील इतिहास से जोड़कर रख सकते हैं। रानी प्रीति सिंह ने साझा किया कि यह पूरा आयोजन कुंवर की अपनी व्यक्तिगत इच्छा और धार्मिक निष्ठा का परिणाम है। इस भव्य आयोजन ने नाभा के ऐतिहासिक महल में एक बार फिर वही पुरानी चमक और राजसी गरिमा वापस लौटा दी है।
---समाप्त---